-सुनील कुमार महला
हर वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन का पर्व मनाया जाता है और उसके अगले दिन चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को रंगों की होली खेली जाती है। किंतु इस वर्ष पूर्णिमा तिथि पर वर्ष का पहला चंद्र ग्रहण पड़ने के कारण होलिका दहन और रंगोत्सव की तिथि को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। ज्योतिषियों के अनुसार इस वर्ष 3 मार्च 2026 को वर्ष का पहला चंद्र ग्रहण पड़ रहा है और यह भारत में भी दृश्यमान होगा। द्रिक पंचांग के अनुसार ग्रहण दोपहर 3 बजकर 20 मिनट से प्रारंभ होकर सायं 6 बजकर 46 मिनट तक रहेगा। चूंकि यह ग्रहण भारत में दिखाई देगा, इसलिए इसका सूतक काल 9 घंटे पूर्व, अर्थात सुबह 6 बजकर 20 मिनट से प्रारंभ हो जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूतक काल में शुभ कार्य, उत्सव, पूजन, भोजन बनाना और ग्रहण करना वर्जित माना जाता है। इस दौरान मंदिरों के कपाट भी बंद कर दिए जाते हैं। ऐसे में रंगों की होली खेलना अशुभ और नकारात्मक प्रभाव देने वाला माना गया है। शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन के अगले दिन ही रंगों की होली खेली जाती है, किंतु इस बार ग्रहण के कारण विशेष सावधानी अपेक्षित है। होलिका दहन 2 मार्च 2026, सोमवार की रात्रि में भद्रा के पुच्छ काल में किया जा सकता है। भद्रा का पुच्छ 2 मार्च को रात्रि 11 बजकर 53 मिनट से 3 मार्च की रात्रि 1 बजकर 26 मिनट तक रहेगा। इसके अतिरिक्त 3 मार्च को प्रातः 5:30 बजे से 6:45 बजे के बीच भी होलिका दहन करना लाभकारी माना गया है, क्योंकि इसके बाद सूतक काल प्रारंभ हो जाएगा। चूंकि 3 मार्च को सूतक और ग्रहण का प्रभाव रहेगा, इसलिए उस दिन रंगों की होली खेलना उचित नहीं है। इस दृष्टि से 4 मार्च 2026 को रंगों की होली मनाना अधिक शुभ और लाभकारी रहेगा। ग्रहण समाप्ति के बाद स्नानादि कर शुद्ध होकर ही किसी भी प्रकार का उत्सव करना चाहिए।
होली का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व:-
होली भारत का एक प्राचीन और लोकजीवन से गहराई से जुड़ा उत्सव है। इसकी जड़ें भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं में गहराई तक समाई हुई हैं। फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन और अगले दिन रंगोत्सव मनाने की परंपरा सदियों पुरानी है। प्राचीन काल में होली केवल एक दिन का त्योहार नहीं होती थी, बल्कि पूरे फाल्गुन मास में फाग और उल्लास का वातावरण बना रहता था। गांवों में चंग और ढोल की थाप पर फाग गीत गूंजते थे, स्वांग और लोकनाट्य प्रस्तुतियां होती थीं तथा समाज के सभी वर्ग मिलकर उत्सव मनाते थे। पूर्वकाल में होली अत्यंत सामुदायिक और सौहार्दपूर्ण होती थी। लोग घर-घर जाकर फाग गाते थे। महिलाएं गाय के गोबर से उपले बनाती थीं, जिन्हें होलिका दहन की अग्नि में अर्पित किया जाता था। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और कृषि संस्कृति से जुड़ी आस्था का प्रतीक था। होलिका पूजन विधि-विधान से किया जाता था, जिसमें परिवार की सुख-समृद्धि और उत्तम फसल की कामना की जाती थी। अग्नि में हरे चने और गेहूं की बालियां सेंकी जाती थीं। इन भुने चनों को ‘होला’ कहा जाता है, जिन्हें प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता था। यह परंपरा रबी की फसल के पकने और कृषि समृद्धि से जुड़ी थी।
रंगों का आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ:-
होलिका दहन के अगले दिन प्राकृतिक रंगों, गुलाल और अबीर से होली खेली जाती थी। लोग गले मिलकर पुराने मतभेद भुला देते थे। होली का मूल संदेश है-मन के विकारों को जलाकर प्रेम, क्षमा और भाईचारे के रंग में रंग जाना।रंगों में तीन प्रमुख रंग माने गए हैं-लाल, हरा और नीला। शेष रंग इन्हीं से निर्मित होते हैं। लाल रंग उत्साह, साहस, सौभाग्य, उमंग और नवजीवन का प्रतीक है। यह मानवीय चेतना में तीव्र ऊर्जा और कंपन उत्पन्न करता है। होली का जोश और उल्लास लाल रंग में ही परिलक्षित होता है।हरा रंग विश्वास, उर्वरता, समृद्धि और प्रगति का प्रतीक है। यह विचारों की हरियाली और जीवन की खुशहाली का संदेश देता है। नीला रंग शांति, स्थिरता और व्यापकता का प्रतीक है। आकाश और समुद्र की विशालता की भांति यह समावेशी भावना का द्योतक है। वास्तु शास्त्र में इसे मानसिक शांति से जोड़ा गया है तथा योग दर्शन में इसे विशुद्ध चक्र (कंठ चक्र) के संतुलन से संबंधित माना जाता है।
साहित्य में होली:-
महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने भी होली के उल्लास और प्रकृति के रंगों का सुंदर चित्रण किया है। उनकी कविता में ‘लाल गुलाल’ और प्रकृति के राग-पराग का जो वर्णन मिलता है, वह होली के सांस्कृतिक सौंदर्य को सजीव कर देता है।



