-सुनील कुमार महला
इन दिनों हमारे देश में परीक्षाओं का दौर चल रहा है और ऐसे समय में बच्चे अक्सर तनाव, अवसाद और डर(एक्जाम फोबिया) का अनुभव करते हैं। परीक्षा को लेकर उनके मन में अनेक प्रश्न उठते हैं-क्या होगा, कैसे होगा, कितने अंक आएंगे, माता-पिता क्या कहेंगे, शिक्षक या पड़ोसी क्या सोचेंगे आदि। लेकिन यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि परीक्षा जीवन की अंतिम कसौटी नहीं है। प्रतिस्पर्धा अपने स्थान पर उचित है, परंतु प्रत्येक बच्चे में व्यक्तिगत भिन्नता होती है। सभी की क्षमताएँ और प्रतिभाएँ अलग-अलग होती हैं, इसलिए तुलना करना कभी भी उचित नहीं होता,यह हमें(माता-पिता , अभिभावकों व शिक्षकों को) समझना चाहिए। किसी में एक गुण होता है तो किसी में दूसरा, इसलिए तुलना के बजाय प्रोत्साहन अधिक आवश्यक है।
बहरहाल, यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि परीक्षा का मौसम आते ही घरों का वातावरण भी बदल जाता है। बोर्ड परीक्षाएँ हों या प्रवेश परीक्षाएँ, लाखों छात्र उम्मीदों और दबाव के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करते हैं। ऐसे में केवल अधिक पढ़ाई ही नहीं, बल्कि सही तरीके से पढ़ाई करना भी जरूरी है, जिसमें शरीर, मन और भावनाओं का संतुलन बना रहे। याद रखिए कि परीक्षा के तनाव से निपटने की शुरुआत शरीर से होती है। कई छात्र देर रात तक जागना या भोजन छोड़ना मेहनत समझ लेते हैं, जबकि पर्याप्त नींद, संतुलित आहार और नियमित व्यायाम ही एकाग्रता तथा स्मरण शक्ति की वास्तविक नींव हैं। पौष्टिक भोजन मस्तिष्क को ऊर्जा देता है और अच्छी नींद पढ़ी हुई जानकारी तथा मुख्य बिंदुओं को याद रखने में सहायक होती है। बड़े पाठ्यक्रम को छोटे-छोटे लक्ष्यों में बाँटना और पढ़ाई के बीच थोड़े विश्राम लेना भी तनाव को कम करता है।
भारतीय परंपरा भी मानसिक संतुलन का महत्व बताती है। योग, प्राणायाम और ध्यान(मेडिटेशन) जैसे सरल अभ्यास तनाव के समय राहत प्रदान कर सकते हैं। जब शरीर शांत होता है, तो मन भी शांत हो जाता है। प्रोग्रेसिव मसल रिलैक्सेशन शरीर में जमा तनाव(स्ट्रेस) को कम करने में सहायक है, जबकि प्रतिदिन लगभग 10 मिनट का ध्यान मन को स्थिर और स्पष्ट बनाता है, जिससे छात्र घबराहट की बजाय आत्मविश्वास के साथ पढ़ाई कर पाते हैं।
यदि कक्षा का वातावरण ऐसा हो, जहाँ गलती को सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाए और रटने के बजाय समझ पर जोर दिया जाए, तो परीक्षा का भय काफी कम हो सकता है। इसके विपरीत, बार-बार तुलना और रैंकिंग तनाव बढ़ा देती है। जब शिक्षक यह संदेश देते हैं कि परीक्षा महत्वपूर्ण है, परंतु जीवन की अंतिम कसौटी नहीं, तो छात्रों में स्वस्थ व सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है।
घर का माहौल भी उतना ही प्रभाव डालता है। यदि माता-पिता केवल अंकों पर ध्यान देने के बजाय बच्चों के प्रयास, प्रगति और व्यक्तित्व विकास को महत्व दें, तो बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है। परीक्षा पहचान नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की एक सीढ़ी है। जब छात्र स्वयं को केवल अंकों से नहीं, बल्कि अपनी बहुआयामी प्रतिभा से पहचानते हैं, तब वे इस चुनौतीपूर्ण दौर को संतुलन, साहस और गरिमा के साथ पार कर सकते हैं।
परीक्षा को कभी भी फोबिया नहीं बनाना चाहिए और जितना पढ़ा है, उसी पर सकारात्मक रहकर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। याद रखें कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं है, जबकि शांत मन, संयम और धैर्य सबसे बड़े गुण हैं। सही खान-पान रखें, पर्याप्त नींद लें और सकारात्मक सोच बनाए रखें। माता-पिता, अभिभावकों व शिक्षकों को बच्चों को प्रोत्साहित करना चाहिए तथा यह समझाना चाहिए कि परीक्षा कोई डरावनी चीज नहीं है। याद रखिए, असफलता हार नहीं होती, बल्कि एक सीख होती है, जो हमें और बेहतर करने के लिए प्रेरित करती है। मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर कोई भी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, इसलिए सबसे जरूरी है-स्वयं पर दृढ़ विश्वास रखना।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि परीक्षा जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अवश्य है, लेकिन पूरी जिंदगी नहीं। सही तैयारी, संतुलित दिनचर्या, सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास के साथ छात्र किसी भी परीक्षा का सामना सहजता से कर सकते हैं। माता-पिता और शिक्षकों का सहयोग, प्रोत्साहन और समझ बच्चों के परीक्षाई तनाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वास्तव में परीक्षा-भय किसी विषय की अज्ञानता से अधिक हमारी मानसिक स्थिति और असफलता के डर से उत्पन्न होता है। यह कोई स्थायी समस्या नहीं है; सही समय प्रबंधन, निरंतर अभ्यास और सकारात्मक सोच के माध्यम से इसे पूरी तरह दूर किया जा सकता है।
अक्सर छात्र परीक्षा को जीवन-मरण का प्रश्न मान लेते हैं, जबकि यह केवल शैक्षणिक मूल्यांकन की एक सामान्य प्रक्रिया है। यदि विद्यार्थी अपनी तैयारी व्यवस्थित रखें और अभिभावक बच्चों की दूसरों से तुलना करना बंद कर दें, तो परीक्षा का बोझ एक रोमांचक चुनौती में बदल सकता है। अंततः, सफलता के लिए मानसिक शांति और स्वयं पर विश्वास उतना ही आवश्यक है, जितना कि पाठ्यक्रम का ज्ञान। इसलिए परीक्षा को डर नहीं, अवसर समझकर शांत मन से आगे बढ़ना ही सफलता का सही मार्ग है।



