डोल का बाढ़: जंगल की रखवाली में बीता दिन, सांझ ढली तो सुरों में गूंजा प्रतिरोध का स्वर

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जयपुर। यह कोई आम शुक्रवार नहीं था। यह एक जंगल की पुकार थी। एक संकल्प का दिन। एक प्रतिरोध की आवाज़।भोमियाजी मंदिर परिसर, जहां आमतौर पर शांति पसरी होती है, आज वहां सुबह से ही हलचल थी जंगल की रखवाली के लिए। सैकड़ों लोगआदिवासी संगठनों से लेकर पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं तक सुबह से लेकर शाम तक पहरेदारी में जुटे रहे। डोल का बाढ़ के जंगल को बचाने के लिए यह सिर्फ एक धरना नहीं, एक चेतना बन चुका है।पाली, आबू रोड, उदयपुर और कई अन्य जिलों से आए संगठनों ने आदिवासियों के नाम पर जंगल काटकर मॉल जैसे निर्माण किए जाने पर आक्रोश और आश्चर्य जताया। उन्होंने इस आंदोलन को केवल समर्थन नहीं, बल्कि अपना हक़ और अपनी ज़िम्मेदारी बताया।दिनभर लोगों ने जंगल की वर्तमान स्थिति, बढ़ते अवैध निर्माण और सरकारी उदासीनता को लेकर जनचेतना फैलाने का अभियान चलाया।
यह प्रतिरोध नारों में नहीं, संवादों में था। यह प्रदर्शन पोस्टर में नहीं, लोगों की आंखों में था। शाम ढली और सूरज अस्त हुआ, तो पत्रिका गेट पर जल उठे सुरों के दीप। शाम 6:30 बजे, 100 से अधिक लोगों की उपस्थिति में एक सांस्कृतिक प्रतिरोध कार्यक्रम आयोजित हुआ। जयपुर से आए कई म्यूज़िशियन्स, लोकगायक और रैपर आर्टिस्ट्स ने अपनी प्रस्तुति के ज़रिए जंगल की पुकार को संगीत में पिरोया। ढोल की थाप, वायलिन के सुर, रैप की धार और लोकगीतों की गूंज ने जैसे पूरे अंधेरे को भी जगा दिया।एक रैपर ने मंच से कहा “ना बिकेगा जंगल, ना झुकेगा ये कारवां, हम खड़े हैं यहां, जब तक बचे हर एक पत्ता यहां।” कार्यक्रम के अंत में सभी ने मिलकर संकल्प लिया “हम डोल का बाढ़ को बचाने के लिए अपनी संपूर्ण शक्ति और जान तक समर्पित करेंगे। यह जंगल सिर्फ हरियाली नहीं, हमारी अस्मिता है।” यह आंदोलन अब सिर्फ डोल का बाढ़ का नहीं रहा, यह एक राष्ट्रीय चेतना का रूप ले रहा है।

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