नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को मुकदमे से जीवन भर संरक्षण देने वाले कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान (CJI) सूर्यकांत की पीठ ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी करते हुए इस विवादित कानून की वैधता पर जवाब मांगा है।
दरअसल, याचिकाकर्ता एनजीओ लोक प्रहरी ने दलील दी है कि इतनी व्यापक कानूनी छूट तो भारत के राष्ट्रपति को भी नहीं दी गई है। याचिका में यह भी कहा गया कि यह प्रावधान स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को नुकसान पहुंचाता है। एनजीओ लोक प्रहरी ने अदालत से इस प्रावधान पर तुरंत रोक लगाने की मांग की थी।
क्या इससे कोई नुकसान हो रहा?
इस पर सुनवाई करते हुए CJI सूर्य कांत ने कहा कि ये एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, हम जांच करेंगे कि क्या इस प्रावधान से कोई नुकसान हो रहा है और क्या संविधान की व्यवस्था के तहत ऐसी छूट दी जा सकती है। हालांकि, CJI की ओर से इस कानून पर कोई रोक नहीं लगाई है। उन्होंने कहा कि फिलहाल स्टे की जरूरत नहीं है।
2023 में कानून में हुआ था संशोधन
गौरतलब है कि 2023 में कानून में संशोधन किया गया था, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को यह संरक्षण दिया गया है कि उनके आधिकारिक काम को लेकर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता है। मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए मुकदमों से मिले सरंक्षण को लेकर कानून मे संशोधन किए जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। जिसमें कहा गया है कि इतनी छूट तो भारत के राष्ट्रपति को नहीं दी गई है।



