दुर्लभ रोगों के इलाज में चुनौतियां

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दुर्लभ रोग दिवस हर साल फरवरी के आखिरी दिन को मनाया जाता है। दुर्लभ रोग दिवस एक वार्षिक वैश्विक दिवस है। इस वर्ष यह दिवस 28 फरवरी को मनाया जा रहा है। यह दिवस हमें सिखाता है कि बीमारी दुर्लभ हो सकती है, लेकिन मरीज नहीं। हर व्यक्ति को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। हर साल इस दिवस की एक विशेष थीम होती है, जो दुर्लभ रोगों से जुड़े मुद्दों को उजागर करती है। दुर्लभ रोग दिवस की थीम मरीजों की आवाज, समान इलाज और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच पर केंद्रित होने की उम्मीद है। इस थीम का उद्देश्य यह दिखाना है कि दुर्लभ रोगों से पीड़ित लोगों को भी वही अधिकार और सुविधाएं मिलनी चाहिए, जो अन्य मरीजों को मिलती हैं। यह दिवस मनाने का उद्देश्य दुर्लभ बीमारियों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और मरीजों को बेहतर उपचार और सुविधाएं दिलाने के लिए समर्थन जुटाना है। यह दिन उन लाखों लोगों की आवाज उठाने का एक मंच है, जो किसी न किसी दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे हैं। दुर्लभ रोग दिवस एक विश्व स्तर पर समन्वित आंदोलन है जो दुर्लभ बीमारियों वाले व्यक्तियों के लिये सामाजिक अवसर, स्वास्थ्य देखभाल, निदान एवं उपचार तक पहुँच में समता सुनिश्चित करने की दिशा में समर्पित है। दुर्लभ रोगों को सामान्य तौर पर मनुष्य में कभी-कभार होने वाली बीमारियों के रूप में परिभाषित किया गया है, जिनका प्रसार भिन्न-भिन्न देशों के बीच अलग-अलग होता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन दुर्लभ रोगों को प्रायः प्रति 1000 जनसंख्या पर 1 या उससे कम की व्यापकता के साथ जीवन पर्यंत दुर्बल करने वाली स्थितियों के रूप में परिभाषित करता है। विभिन्न देशों की अपनी-अपनी परिभाषाएँ हैं। उदाहरण के लिये संयुक्त राज्य अमेरिका 2 लाख से कम रोगियों को प्रभावित करने वाली बीमारियों को दुर्लभ मानता है, जबकि यूरोपीय संघ 10 हज़ार लोगों में 5 से अधिक नहीं होने की सीमा निर्धारित करता है।
भारत में वर्तमान में कोई मानक परिभाषा नहीं है, लेकिन दुर्लभ रोगों के संगठन भारत (Organisation of Rare Diseases India- ORDI) ने सुझाव दिया है कि उस बीमारी को दुर्लभ रोग के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिये यदि यह 5,000 लोगों में से 1 या उससे कम को प्रभावित करता है। दुर्लभ रोगों के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती है समय पर पहचान और इलाज की उपलब्धता। कई बीमारियों के लिए अभी तक स्थायी इलाज मौजूद नहीं है। कुछ दवाइयां बहुत महंगी होती हैं और हर देश में उपलब्ध भी नहीं होतीं। इसके अलावा, विशेषज्ञ डॉक्टरों और टेस्टिंग सुविधाओं की कमी भी एक बड़ी समस्या है।
एक मिडिया रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में 30 करोड़ लोग दुर्लभ बीमारियों से प्रभावित हैं।
दुर्लभ बीमारियाँ लगभग 3.5 से 5.9 प्रतिशत आबादी को प्रभावित करती हैं। 72 प्रतिशत दुर्लभ बीमारियाँ आनुवंशिक होती हैं, जिनमें से 7000 से अधिक में विभिन्न विकार और लक्षण देखने को मिलते हैं। 75 प्रतिशत दुर्लभ बीमारियाँ बच्चों को प्रभावित करती हैं। जिसमें 70 प्रतिशत दुर्लभ बीमारियों की शुरुआत उन्हें बचपन में होती है।
कुछ दुर्लभ बीमारियां जन्मजात होती हैं, तो कुछ जीवन के किसी भी चरण में विकसित हो सकती हैं। कुछ प्रमुख दुर्लभ बीमारियां इस प्रकार हैं:- गौचर डिजीज – एंजाइम की कमी से हड्डियों और अंगों को नुकसान। हंटिंगटन डिजीज – न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर, जो धीरे-धीरे दिमाग को प्रभावित करता है। मस्कुलर डिस्ट्रॉफी – मांसपेशियों की कमजोरी और विकृति। हेमोफिलिया – खून का थक्का न बनने की समस्या। और सिस्टिक फाइब्रोसिस – फेफड़ों और पाचन तंत्र को प्रभावित करने वाली बीमारी।

-बाल मुकुन्द ओझा

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