जयपुर। राजस्थान में पंचायतीराज और शहरी निकायों का कार्यकाल पूरा होने के साल भर बाद भी चुनाव नहीं करवाने के मुद्दे पर पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने राज्य सरकार पर निशाना साधा है। गहलोत ने एक्स पर बयान जारी कर सरकार पर सवाल उठाए हैं।
गहलोत ने एक्स पर लिखा- भाजपा सरकार की अलोकतांत्रिक सोच के कारण राजस्थान में संवैधानिक संकट गहराता जा रहा है। पंचायतों और नगरीय निकायों में एक साल से ज्यादा समय से चुनाव नहीं कराए जाना और उनकी जगह सरकारी प्रशासकों की नियुक्ति, यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार है।
गहलोत ने लिखा- संविधान का अनुच्छेद 243 E में साफ प्रावधान है कि पंचायतों का कार्यकाल पांच साल का होगा और समय पर चुनाव अनिवार्य हैं। इसी तरह अनुच्छेद 243U नगरीय निकायों के लिए भी यही बाध्यता तय करता है। वहीं अनुच्छेद 243K के तहत राज्य निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के रूप में स्थापित किया गया है, जिसकी जिम्मेदारी चुनाव कराना है।
बहानों के पीछे छिपकर चुनाव टालने का प्रयास किया
गहलोत ने लिखा- यह किसी सरकार की इच्छा का विषय नहीं, संविधान से निर्धारित अनिवार्य दायित्व है। इसके बावजूद राज्य सरकार ने परिसीमन, पुनर्गठन और तथाकथित वन स्टेट, वन इलेक्शन जैसे बहानों के पीछे छिपकर चुनावों को टालने का प्रयास किया। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में विकास किशनराव गवाली मामले में स्पष्ट रूप से कहा है कि इस प्रकार के कारण चुनाव टालने का वैध आधार नहीं हो सकते।
सरकार चुनाव करवाने पर गंभीर नहीं
गहलोत ने लिखा- राजस्थान हाईकोर्ट ने फरवरी, मार्च और नवंबर 2025 में बार-बार निर्देश दिए, लेकिन सरकार ने हर बार इनकी अनदेखी की। आखिरकार 439 याचिकाओं पर एक साथ फैसला देते हुए कोर्ट ने 15 अप्रैल 2026 की अंतिम समय सीमा निर्धारित की। सुप्रीम कोर्ट का एसएलपी खारिज कर इस आदेश को बरकरार रखा जाना इस बात का प्रमाण है कि न्यायपालिका ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है, लेकिन सरकार की ओर से अब तक गंभीरता का अभाव दिखाई देता है।
जनता की भागीदारी को कुचलना दुर्भाग्यूपर्ण
गहलोत ने लिखा- जब कोई सरकार संविधान के अनुच्छेद 243E, 243U और 243K का लगातार उल्लंघन करे, नागरिकों के मताधिकार को एक साल से ज्यादा समय तक बाधित रखे और कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों की अवहेलना करे, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संवैधानिक विघटन की स्थिति है। 73वें और 74वें संविधान संशोधनों की मूल भावना विकेंद्रीकरण, स्थानीय स्वशासन और जनता की भागीदारी को इस प्रकार कुचलना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।



