चंडीगढ़। भारत की सांस्कृतिक और कलात्मक विरासत जितनी प्राचीन है, उतनी ही नवाचारी भी। इसी नवाचार का अद्भुत उदाहरण है चंडीगढ़ स्थित रॉक गार्डन—एक ऐसा स्थल जहाँ बेकार समझी जाने वाली वस्तुओं ने कला का अमर रूप ले लिया। यह केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सृजनशीलता, धैर्य और पर्यावरण चेतना का जीवंत प्रतीक है।
एक व्यक्ति, एक सपना, और एक क्रांतिरॉक गार्डन की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। इसके निर्माता नेक चंद एक साधारण सरकारी कर्मचारी थे, लेकिन उनके भीतर एक असाधारण कलाकार बसता था। वर्ष 1957 में उन्होंने चुपचाप शहर के बाहरी इलाके में पड़े खंडहरनुमा स्थान पर कचरे और टूटे-फूटे सामान से मूर्तियाँ बनानी शुरू कीं।उस समय किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह छोटा-सा प्रयास आगे चलकर विश्व प्रसिद्ध कला-स्थल का रूप ले लेगा। टूटी चूड़ियाँ, फेंकी हुई टाइलें, चीनी मिट्टी के बर्तन, कांच की बोतलें, पत्थर और औद्योगिक कचरा—ये सब उनके लिए बेकार वस्तुएँ नहीं, बल्कि सृजन के साधन थे।
गुप्त साधना से सार्वजनिक पहचान तककरीब दो दशकों तक यह कार्य गुप्त रूप से चलता रहा। जब प्रशासन को इसकी जानकारी मिली, तो प्रारंभ में इसे अवैध निर्माण माना गया। परंतु जब अधिकारियों और जनता ने इस अद्भुत कला को देखा, तो विरोध प्रशंसा में बदल गया। वर्ष 1976 में इसे आधिकारिक रूप से सार्वजनिक उद्यान घोषित किया गया।आज यह उद्यान लगभग 40 एकड़ में फैला हुआ है और हर वर्ष लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है।
स्थापत्य और संरचना की विशेषताएँरॉक गार्डन में प्रवेश करते ही ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी रहस्यमयी लोक में प्रवेश कर गए हों। संकरे रास्ते, ऊँची-नीची दीवारें, छोटे-छोटे दरवाजे और अचानक सामने आ जाती मूर्तियों की कतारें—यह सब अनुभव को रोमांचक बना देता है।यहाँ मानव आकृतियाँ, पशु-पक्षियों की प्रतिमाएँ, ग्रामीण जीवन के दृश्य और नृत्य करती स्त्रियों की मूर्तियाँ दिखाई देती हैं। विशेष बात यह है कि इन सभी को बेकार सामग्री से तैयार किया गया है। टूटी चूड़ियों से बनी पोशाकें, पत्थरों से तराशे गए चेहरे और बोतलों से सजाई गई दीवारें कला की नई परिभाषा प्रस्तुत करती हैं।
पर्यावरण संरक्षण का संदेशरॉक गार्डन केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं है; यह पर्यावरण संरक्षण का भी सशक्त संदेश देता है। जिस सामग्री को आमतौर पर कचरा समझकर फेंक दिया जाता है, वही यहाँ कला का आधार बनती है।आज जब विश्व पर्यावरण संकट से जूझ रहा है, तब यह उद्यान हमें सिखाता है कि पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) केवल आवश्यकता नहीं, बल्कि रचनात्मक अवसर भी है। यह स्थान बताता है कि यदि दृष्टि सकारात्मक हो, तो बेकार वस्तुएँ भी अमूल्य बन सकती हैं।
चंडीगढ़ की पहचानचंडीगढ़ अपनी आधुनिक योजना और स्वच्छता के लिए प्रसिद्ध है। इसी सुव्यवस्थित शहर में स्थित रॉक गार्डन उसकी सांस्कृतिक पहचान को और समृद्ध करता है। जहाँ एक ओर शहर आधुनिक वास्तुकला का उदाहरण है, वहीं यह उद्यान लोक कला और जन-सृजन की मिसाल पेश करता है।
कला और समाज का संगमरॉक गार्डन केवल एक कलाकार की कल्पना का परिणाम नहीं, बल्कि सामूहिक भावना का प्रतीक भी है। समय के साथ अनेक कारीगर और स्थानीय लोग इस परियोजना से जुड़े। इससे न केवल कला का विस्तार हुआ, बल्कि रोजगार के अवसर भी उत्पन्न हुए।यहाँ आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम और नृत्य-प्रस्तुतियाँ इसे जीवंत बनाए रखती हैं। खुले प्रांगण और झरनों के पास बैठकर लोग प्रकृति और कला का आनंद लेते हैं।
पर्यटन और अर्थव्यवस्था पर प्रभावरॉक गार्डन आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका है। विदेशी पर्यटक विशेष रूप से इस अनूठी अवधारणा को देखने आते हैं। इससे स्थानीय पर्यटन उद्योग को बढ़ावा मिला है—होटल, रेस्तरां, हस्तशिल्प बाजार और परिवहन सेवाएँ सभी इससे लाभान्वित होते हैं।यह स्थल भारत की रचनात्मक क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है और “वेस्ट टू वंडर” की अवधारणा को साकार रूप देता है।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणाआज के युवाओं के लिए रॉक गार्डन प्रेरणा का स्रोत है। यह बताता है कि संसाधनों की कमी रचनात्मकता में बाधा नहीं बनती। आवश्यकता केवल दृष्टिकोण और समर्पण की होती है।स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थी यहाँ शैक्षणिक भ्रमण के लिए आते हैं। कला, वास्तुकला और पर्यावरण अध्ययन के छात्रों के लिए यह एक जीवंत प्रयोगशाला है। समय के साथ विकाससमय-समय पर इस उद्यान में नई संरचनाएँ जोड़ी गई हैं। रख-रखाव और संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाता है ताकि यह धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके। नेक चंद के निधन के बाद भी उनकी विरासत को आगे बढ़ाने के प्रयास जारी हैं। उनकी सोच आज भी इस उद्यान की हर दीवार और हर मूर्ति में जीवित है।



