आदिवासियों की दशा और दिशा पर गहन चिंतन और मंथन की जरुरत

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-बालमुकुन्द ओझा
जनजातीय समुदायों की गौरवशाली विरासत, स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से देश में एक नवम्बर से जनजातीय गौरव पखवाड़ा मनाया जारहा है। जनजातीय गौरव पखवाड़ा भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय की ओर से 1 से 15 नवंबर 2026 तक देशभर में मनाया जारहा है । मंत्रालय के अनुसार, यह पखवाड़ा केवल जनजातीय नायकों को याद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम छोर तक रहने वाले जनजातीय परिवारों तक पहुंचाने और समुदायों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने का विशेष अभियान भी है। इस दौरान देशभर में विभिन्न राष्ट्रीय कार्यक्रम, सांस्कृतिक आयोजन, स्वास्थ्य शिविर और जनकल्याणकारी योजनाओं से जुड़ी गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। यह पखवाड़ा 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में समाप्त होगा, जो धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की जयंती है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जनजातीय गौरव पखवाड़े का उद्देश्य भगवान बिरसा मुंडा सहित जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत को सम्मान देने के साथ-साथ जनजातीय समुदायों के विकास, अधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तीकरण को नई गति देना है।
आदिवासी समुदाय को प्रकृति का सबसे करीबी माना जाता है। इस समुदाय ने संसाधनों के आभाव में भी अपनी एक खास पहचान बनाई है। सियासत में आदिवासी समुदाय को सत्ता की संजीवनी माना और समझा जाता है। राजनीतिक पार्टियां विकास पर कम और अपने सियासी फायदे के लिए आदिवासियों का उपयोग करने से नहीं चूकते। भारत में आदिवासी संस्कृति की अपनी विशिष्ट पहचान है। यह जनजाति लोगों का एक ऐसा समूह है, जिनकी भाषा, संस्कृति, जीवनशैली और सामाजिक-आर्थिक स्थिति भिन्न है। मगर देशभक्ति और राष्ट्र निर्माण की भावना उनमें कूट कूट कर भरी है। प्रकृति के सवसे करीब होने के साथ ही इस समुदाय का गीत, संगीत और नृत्य से सदा ही गहरा लगाव रहा है। आदिवासी शब्द प्राचीन-काल से निवास करने वाली जातियों के लिए प्रयोग किया जाता है। आदिवासी शब्द आदि और वासी दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ अनादि-काल से किसी भौगोलिक स्थान में वास करने वाला व्यक्ति या समूदाय होता है। आजादी के बाद एक लम्बी जद्दोजहद के बाद भी यह तय नहीं हो पाया की हमारे देश में आदिवासी कौन है। साधारण रूप से कहा जाये तो वे लोग जो आधुनिक सभ्यता और प्रगति से दूर रहकर जंगलों में निवास करते है। जमीन होते हुए भी जमीन हीन है। आज भी उनका खाना मोटा है।
आदिवासी अरसे से अपने अकूत संसाधनों का दोहन देखती रही है और पिछड़ापन तथा कुपोषण से बुरी तरह ग्रस्त रही है। आदिवासी अपनी परंपरा और संस्कृति की रक्षा के साथ विकास के नाम पर अपने रहवास की अकूत जल, जंगल, जमीन की संपदा की रक्षा के लिए लड़ते भी रहे हैं। एक सरकारी रिपोर्ट बताती है कि देश में 50 प्रतिशत या इससे ज्यादा जनजातीय आबादी वाले कुल 36,428 गांव हैं। आधी से ज्यादा आदिवासी आबादी वाले गांवों में मप्र देश में पहले नंबर पर है। एमपी के 7307 गांवों में आदिवासियों की आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा है। दूसरे नंबर पर राजस्थान में 4302 गांवों में 50 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है। इसके बाद छत्तीसगढ़ में 4029, झारखंड में 3891, गुजरात में 3764, महाराष्ट्र में 3605 गांवों में आधे से ज्यादा आदिवासी रहते हैं। छल, प्रपंच और कपट की सियासत से दूर देश की आदिवासी आबादी आज भी रोजी रोटी के लिए जूझ रही है। आदिवासी आबादी आज़ादी के 77 साल बाद भी आधुनिक सभ्यता और प्रगति से दूर रहकर जंगलों में निवास करती है। जमीन होते हुए भी जमीन हीन है। आज भी उनका खाना मोटा है। जंगल के इलाकों में रहने के कारण सरकार संचालित विकास योजनाएं इन तक नहीं पहुंच पाती।
भारत में अनुसूचित आदिवासी समूहों की संख्या 700 से अधिक है। भारत की जनगणना 1951 के अनुसार आदिवासियों की संख्या 1,91,11,498 थी जो 2001 की जनगणना के अनुसार 8,43,26,240 हो गई। वर्तमान में देश में लगभग 11 करोड़ आदिवासियों की आबादी है और विभिन्न आंकड़ों की मानें तो हर दसवां आदिवासी अपनी जमीन से विस्थापित है। बढ़ती जनसंख्या, नगरों के विकास और औद्योगिकीकरण के कारण आदिवासियों की जमीने छिन गईं, जिसके कारण इनकी परंपरागत जीवन पद्धति में भारी बदलाव आया है। धरती पर सबसे पहले सभ्य होने वाली यही जन-जातियां ही थीं। लेकिन, विडंबना यह है कि उनके बाद सभ्यता का मुंह देखने वाली जातियां आज उन्हें आदिवासी कहने लगी हैं। भारत के संविधान में आदिवासी समुदाय को जन जाति का दर्जा दिया गया है।
भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में बोडो, भील, खासी, जाट, गोंड, मुंडा, खड़िया, हो, मीणा, उरांव, परधान, बिरहोर, पारधी, सहरिया, संथाल, आंध, टोकरे, कोली, महादेव, कोली, कोली, मल्हार, टाकणकार आदि शामिल है। पौराणिक और धार्मिक ग्रंथों में इन्हें अत्विका और वनवासी भी कहा गया है। महात्मा गांधी ने आदिवासियों को गिरिजन (पहाड़ पर रहने वाले लोग) कहकर पुकारा है। आदिवासी भारत के मूल निवासी हैं जो अनंतकाल से यहां निवास करते हैं। आदिवासी समाज जंगलों के वास्तविक रक्षक है, क्यों कि इनका भोजन कंद मूल तथा जंगली फल हुआ करता था।

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