जिस दुनिया में हर चीज का बाजार है, वहाँ काश इंसानियत, प्रेम, सहिष्णुता और दूसरों को जीने देने की भावना का भी कोई आईपीओ आता! लोग उसमें निवेश करते और बदले में एक ऐसी दुनिया पाते, जहाँ हर व्यक्ति अपने हिस्से की खुशियाँ जी सकता और दूसरों की खुशियों का सम्मान कर सकता।
आज के दौर में आईपीओ यानी इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग का नाम सुनते ही लोगों की दिलचस्पी बढ़ जाती है। कौन-सी कंपनी बाजार में उतर रही है, उसमें निवेश करने से कितना लाभ मिलेगा और भविष्य में उसके शेयर कितनी ऊँचाई छू सकते हैं, इन सब बातों पर खूब चर्चा होती है। लोग अपना धन बढ़ाने के लिए अवसर तलाशते हैं। लेकिन कभी-कभी मन में एक विचार आता है, काश! ‘जियो और जीने दो’ का भी कोई आईपीओ आता!
एक ऐसा आईपीओ, जिसमें निवेश करने के लिए धन नहीं, बल्कि प्रेम, संवेदना, सहिष्णुता और उदारता की जरूरत होती। जहाँ लाभांश के रूप में पैसा नहीं, बल्कि सुकून मिलता। जहाँ निवेशक को ऐसी दुनिया मिलती, जिसमें वह स्वयं भी सम्मानपूर्वक जी सके और दूसरों को भी उनकी पसंद के अनुसार जीवन जीने दे।
लेकिन सवाल यह है कि क्या आज हमें ऐसे आईपीओ की सबसे ज्यादा जरूरत नहीं है?
हमने विज्ञान और तकनीक के सहारे दुनिया की दूरियाँ कम कर दी हैं। मोबाइल ने पूरी दुनिया को हमारी मुट्ठी में ला दिया है। हम दूसरों की जिंदगी के बारे में पहले से कहीं अधिक जानते हैं, लेकिन उनकी भावनाओं को समझने का धैर्य शायद कम होता जा रहा है। किसने क्या पहना, क्या खाया, किससे संबंध रखा, किस विचार को अपनाया और किस तरह जीवन जिया, इन सब पर हमारी नजर रहती है। कभी परंपरा के नाम पर, कभी सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर और कभी अपनी सोच को श्रेष्ठ मानकर हम दूसरों की जिंदगी में दखल देने लगते हैं।
विडंबना देखिए कि अपनी जिंदगी में कोई हस्तक्षेप करे तो हमें अपनी स्वतंत्रता याद आने लगती है, लेकिन दूसरों की जिंदगी में हस्तक्षेप करने का अवसर मिले तो हम स्वयं को उनका हितैषी समझने लगते हैं।
हम चाहते हैं कि हमारे विचारों का सम्मान हो, लेकिन दूसरों के विचार हमसे अलग हों तो हमें परेशानी होने लगती है। हम अपने लिए आजादी चाहते हैं, मगर दूसरे अपनी पसंद से जीवन जिएँ तो उनकी आलोचना करने लगते हैं। हर व्यक्ति अपने लिए खुला आकाश चाहता है, लेकिन दूसरे के आकाश में उड़ते पंछी को देखकर बेचैन हो उठता है।
‘जियो और जीने दो’ केवल एक सुंदर वाक्य नहीं, बल्कि सभ्य समाज की बुनियादी शर्त है।
इसका अर्थ यह नहीं कि अन्याय देखकर चुप रहा जाए या गलत कार्यों का विरोध करना छोड़ दिया जाए। इसका अर्थ है कि जब तक किसी का व्यवहार दूसरों के अधिकारों, सुरक्षा और सम्मान को नुकसान नहीं पहुँचाता, तब तक उसे अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने का अवसर मिलना चाहिए।
हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ अलग हैं। किसी की खुशी सादगी में है, तो किसी की उपलब्धियों में। कोई परंपराओं से जुड़कर आनंदित होता है, तो कोई नए रास्तों पर चलकर अपना भविष्य बनाना चाहता है। किसी को भीड़ पसंद है, तो किसी को एकांत में सुकून मिलता है। जब तक किसी की पसंद से दूसरे का अधिकार प्रभावित नहीं होता, तब तक केवल अपनी पसंद को श्रेष्ठ मानकर दूसरों को गलत ठहराना कहाँ तक उचित है?
हम अक्सर भूल जाते हैं कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल अपनी इच्छाओं को पूरा करना नहीं, बल्कि दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करना भी है। मेरी आजादी वहीं तक सार्थक है, जहाँ मैं किसी दूसरे की आजादी को कुचलना शुरू नहीं करता।
परिवारों में बच्चों की रुचियों को कभी-कभी यह कहकर दबा दिया जाता है कि लोग क्या कहेंगे। युवाओं के सपनों को सामाजिक प्रतिष्ठा की कसौटी पर तौला जाता है। किसी की वेशभूषा, खानपान, भाषा या जीवनशैली को लेकर टिप्पणियाँ की जाती हैं। पड़ोसी के घर में क्या हो रहा है, कौन किससे मिलता है और कौन किस तरह रहता है, इस पर चर्चा करने वालों की कमी नहीं है।
किसी को सही सलाह देना और उसकी जिंदगी अपने हिसाब से चलाना दो अलग बातें हैं। चिंता करना संवेदनशीलता है, लेकिन चिंता के नाम पर किसी की स्वतंत्रता छीन लेना नियंत्रण की इच्छा है। हम दूसरों की जिंदगी सुधारने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपनी सोच सुधारने का अवसर ही नहीं निकाल पाते।
काश! ‘जियो और जीने दो’ का आईपीओ आता, तो उसका पहला निवेश हमें अपने भीतर करना पड़ता। हमें अपने अहंकार का कुछ हिस्सा छोड़ना पड़ता, अपनी धारणाओं पर पुनर्विचार करना पड़ता और यह स्वीकार करना पड़ता कि केवल हमारा नजरिया ही सही नहीं हो सकता।
इस आईपीओ में निवेश के कुछ सरल नियम होते। दूसरों को सुनना सीखिए। बिना पूरी बात जाने किसी के बारे में निर्णय मत कीजिए। असहमति को अपमान का अधिकार मत बनाइए। जिस सम्मान की अपेक्षा आप अपने लिए करते हैं, वही सम्मान दूसरों को भी दीजिए।
कल्पना कीजिए, यदि माता-पिता बच्चों की प्रतिभा समझकर उनके सपनों को प्रोत्साहित करें, पड़ोसी एक-दूसरे की जिंदगी में अनावश्यक दखल देने के बजाय सुख-दुख में सहयोगी बनें और समाज किसी की अलग पहचान का उपहास उड़ाने के बजाय उसका सम्मान करे, तो हमारी दुनिया कितनी सुंदर हो सकती है!
इसके लिए किसी बड़े अभियान या कानून की प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं। शुरुआत अपने घर, अपने व्यवहार और अपनी सोच से की जा सकती है।
इंसानियत में किया गया निवेश ऐसा है, जिसका लाभ केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। आप किसी का सम्मान करते हैं, तो उसके भीतर भी दूसरों का सम्मान करने की भावना मजबूत हो सकती है। आप किसी की परेशानी में उसका साथ देते हैं, तो समाज में भरोसे की एक नई कड़ी बनती है। आप किसी को उसकी पसंद से जीने देते हैं, तो उसके जीवन में स्वतंत्रता के साथ-साथ आपके प्रति सम्मान भी बढ़ता है।
हम आर्थिक लाभ के लिए लंबी योजनाएँ बनाते हैं, लेकिन सामाजिक सद्भाव के लिए छोटे-छोटे प्रयास भी कई बार नहीं करते। धन की कीमत समझते हैं, लेकिन रिश्तों में विश्वास की कीमत भूल जाते हैं। अपनी प्रतिष्ठा की चिंता करते हैं, लेकिन दूसरों के आत्मसम्मान को चोट पहुँचाने से पहले नहीं सोचते।
आखिर जीवन सीमित है। फिर क्यों न इसे एक-दूसरे की जिंदगी कठिन बनाने के बजाय आसान बनाने में लगाया जाए? क्यों न दूसरों की कमियाँ गिनाने के बजाय उनकी परिस्थितियों को समझा जाए? क्यों न अपनी पसंद का जीवन जीते हुए दूसरों की पसंद के लिए भी जगह बनाई जाए?
काश! ‘जियो और जीने दो’ का आईपीओ सचमुच आता। उसकी सफलता का पैमाना शेयरों की कीमत नहीं, समाज में बढ़ता प्रेम होता। उसका लाभांश दूसरों के चेहरे पर मुस्कान होता और उसका बाजार वह दुनिया होती, जहाँ किसी को अपनी पहचान छिपाकर न जीना पड़े, किसी को अपनी पसंद के लिए अपमानित न होना पड़े और किसी को दूसरों की अपेक्षाएँ पूरी न कर पाने के कारण अपने ही जीवन में पराया महसूस न करना पड़े।
लेकिन इस आईपीओ के आने का इंतजार क्यों किया जाए? इसकी शुरुआत तो आज, अभी और इसी क्षण हो सकती है। न आवेदन भरने की जरूरत है, न बैंक खाते की और न किसी बाजार में सूचीबद्ध होने की। बस मन में थोड़ा प्रेम, व्यवहार में थोड़ा सम्मान और सोच में थोड़ी उदारता जगह देनी होगी।
हम स्वयं अच्छे से जिएँ और दूसरों को भी अच्छे से जीने दें। किसी की खुशी में बाधा बनने के बजाय उसकी खुशी का सम्मान करें। किसी की राह रोकने के बजाय उसे आगे बढ़ने का अवसर दें।
क्योंकि जिंदगी कोई ऐसी दौड़ नहीं है, जिसमें हमारे आगे निकलने के लिए किसी दूसरे को पीछे गिरना ही पड़े। जिंदगी एक साझा यात्रा है, जिसमें हर व्यक्ति को अपने हिस्से की धूप, अपनी पसंद का आकाश और सुकून से साँस लेने की थोड़ी-सी जगह मिलनी चाहिए।
यही इंसानियत का सबसे मूल्यवान निवेश है, यही जीवन का सबसे सुंदर लाभांश है और यही वह आईपीओ है, जिसमें निवेश करके पूरी दुनिया लाभान्वित हो सकती है।
काश! ‘जियो और जीने दो’ का भी आईपीओ आता!
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