1933 में शुरू हुआ विशाखापट्टनम पोर्ट अब 8.26 करोड़ टन पर, लेकिन सामने खड़ी है अडानी की चुनौती

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-सरकारी पोर्ट की विरासत, विशाल क्षमता और हजारों करोड़ का कारोबार; दूसरी ओर अडानी का गंगावरम गहरे पानी, तेज ऑपरेशन और आधुनिक तकनीक के सहारे बढ़ा रहा दबदबा

विशाखापट्टनम। करीब नौ दशक पहले खनिज अयस्क के सीमित निर्यात से शुरू हुआ विशाखापट्टनम पोर्ट आज देश के प्रमुख समुद्री व्यापार केंद्रों में अपनी पहचान बना चुका है। वर्ष 1933 में जिस पोर्ट पर समुद्री कारोबार की शुरुआत हुई थी, वही आज करोड़ों टन कार्गो संभालने वाली आधुनिक समुद्री लॉजिस्टिक्स व्यवस्था में बदल चुका है। वित्त वर्ष 2024-25 में Visakhapatnam Port Authority ने रिकॉर्ड 82.62 मिलियन टन यानी करीब 8.26 करोड़ टन कार्गो संभाला, जबकि पोर्ट प्रबंधन ने अगले चरण में 9 करोड़ टन कार्गो का लक्ष्य रखा है।

लेकिन विशाखापट्टनम की समुद्री अर्थव्यवस्था की कहानी अब केवल सरकारी पोर्ट तक सीमित नहीं रह गई है। शहर से करीब 15 किलोमीटर दक्षिण में स्थित गंगावरम पोर्ट, जिसे अब अडानी समूह संचालित करता है, आधुनिक तकनीक, गहरे पानी, बड़े जहाजों की क्षमता और तेज कार्गो निकासी के आधार पर लगातार अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। अडानी ने 2022 में गंगावरम पोर्ट का शेष 58.1 प्रतिशत हिस्सा हासिल कर इसे अपनी 100 प्रतिशत स्वामित्व वाली कंपनी बना लिया था।

यही वजह है कि विशाखापट्टनम के समुद्री कारोबार में अब एक दिलचस्प प्रतिस्पर्धी तस्वीर दिखाई देती है। एक तरफ दशकों पुराना सरकारी पोर्ट है, जिसके पास स्थापित बुनियादी ढांचा, विशाल कार्गो आधार और रणनीतिक महत्व है, तो दूसरी तरफ निजी क्षेत्र का गंगावरम पोर्ट है, जो बड़े जहाजों, ऑटोमेशन, तेज टर्नअराउंड और मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी को अपनी ताकत बनाकर आगे बढ़ रहा है।

विशाखापट्टनम पोर्ट का इतिहास 7 अक्टूबर 1933 से जुड़ा है, जब एसएस जलदुर्गा जहाज के प्रवेश के साथ आधुनिक पोर्ट संचालन की शुरुआत हुई। शुरुआती दौर में खनिज अयस्कों का निर्यात इसका प्रमुख कारोबार था। धीरे-धीरे औद्योगिक विकास बढ़ा और पोर्ट पर कोयला, लौह अयस्क, इस्पात, पेट्रोलियम उत्पाद, उर्वरक, कंटेनर और अन्य औद्योगिक माल की आवाजाही बढ़ती चली गई।

आज इस पोर्ट का hinterland केवल आंध्र प्रदेश तक सीमित नहीं है। ओडिशा, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और देश के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों तक इसका कारोबारी नेटवर्क फैला हुआ है। यही वजह है कि विशाखापट्टनम पोर्ट की गतिविधियों का सीधा संबंध पूर्वी और मध्य भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था से जुड़ता है।

पोर्ट की भौगोलिक स्थिति भी इसकी बड़ी ताकत है। डॉल्फिन्स नोज की प्राकृतिक संरचना पोर्ट को समुद्री परिस्थितियों से संरक्षण देने में मदद करती है। बड़े जहाजों को संभालने की क्षमता और विभिन्न प्रकार के कार्गो के लिए विकसित बर्थ इसे लंबे समय से पूर्वी तट का महत्वपूर्ण समुद्री केंद्र बनाए हुए हैं।

कंटेनर कारोबार के क्षेत्र में भी पोर्ट ने अपनी क्षमता बढ़ाई है। आधुनिक कंटेनर टर्मिनल में लंबी क्वे, क्वे क्रेन, इलेक्ट्रिक यार्ड उपकरण, ग्राउंड स्लॉट, रेल साइडिंग और डिजिटल गेट जैसी सुविधाएं विकसित की गई हैं। कंटेनर कारोबार में तेजी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बड़े आकार के कंटेनर जहाजों को संभालने की क्षमता लगातार बढ़ाई जा रही है।

लेकिन इस पूरी तस्वीर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी विशाखापट्टनम पोर्ट और निजी गंगावरम पोर्ट के बीच प्रतिस्पर्धा आने वाले वर्षों में किस दिशा में जाएगी?

अडानी का गंगावरम पोर्ट इस सवाल को और महत्वपूर्ण बनाता है। कंपनी के अनुसार गंगावरम एक all-weather deep-water multipurpose port है। यहां नौ बर्थ हैं और करीब 19.5 मीटर तक की गहराई वाले बर्थ उपलब्ध हैं। पोर्ट सुपर कैपेसाइज जहाजों को संभालने की क्षमता रखता है। इसके पास बल्क, ब्रेक बल्क और कंटेनर कार्गो के लिए सुविधाएं हैं तथा रेल और सड़क नेटवर्क के जरिए आठ राज्यों के hinterland से संपर्क बताया गया है।

यहीं से दोनों व्यवस्थाओं के बीच अंतर भी सामने आता है। सरकारी विशाखापट्टनम पोर्ट का सबसे बड़ा आधार उसकी पुरानी और स्थापित समुद्री पहचान, विविध कार्गो क्षमता और व्यापक सरकारी बुनियादी ढांचा है। दूसरी ओर गंगावरम की ताकत उसके गहरे पानी, बड़े जहाजों को संभालने की क्षमता, अत्यधिक मशीनीकृत कार्गो हैंडलिंग और तेज evacuation व्यवस्था में दिखाई देती है।

अडानी की रिपोर्ट के अनुसार गंगावरम पोर्ट की क्षमता 64 मिलियन टन तक है और वित्त वर्ष 2025-26 में पोर्ट ने 36.6 मिलियन टन का throughput दर्ज किया। पोर्ट पर कंटेनर टर्मिनल भी संचालित है और हाल के वर्षों में यहां गहरे ड्राफ्ट वाले बड़े जहाजों की आवाजाही तथा कार्गो संचालन के नए रिकॉर्ड दर्ज किए गए हैं।

यानी मुकाबला केवल इस बात का नहीं है कि कौन कितना कार्गो संभालता है। असली प्रतिस्पर्धा कितनी तेजी से जहाज को बर्थ दिया जाता है, कितनी तेजी से माल उतारा या चढ़ाया जाता है, कितनी जल्दी माल रेल और सड़क तक पहुंचता है और ग्राहक को कुल लॉजिस्टिक्स लागत कितनी पड़ती है, इस पर निर्भर करेगी।

यही वह क्षेत्र है जहां निजी पोर्ट तेजी से बदलाव कर रहे हैं। अडानी समूह अपने पोर्ट नेटवर्क को केवल जहाजों से माल उतारने-चढ़ाने की व्यवस्था के रूप में नहीं देखता, बल्कि पोर्ट, रेल, सड़क, वेयरहाउसिंग और लॉजिस्टिक्स को एक साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रहा है। कंपनी ने FY2025-26 के लिए अपने पोर्ट नेटवर्क में ऑटोमेशन, डिजिटल गेट, क्षमता विस्तार और मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी पर जोर दिया है।

विशाखापट्टनम के लिए यह प्रतिस्पर्धा एक चुनौती भी है और अवसर भी। चुनौती इसलिए क्योंकि यदि किसी पोर्ट की तुलना में दूसरे पोर्ट पर जहाजों का टर्नअराउंड तेज हो, बड़े जहाज आसानी से लग सकें और कार्गो तेजी से बाहर निकल सके, तो शिपिंग कंपनियां और कार्गो मालिक स्वाभाविक रूप से उस विकल्प पर विचार करते हैं। अवसर इसलिए क्योंकि प्रतिस्पर्धा सरकारी पोर्ट को भी अपनी सुविधाओं, तकनीक, उत्पादकता और ग्राहक सेवाओं को लगातार बेहतर करने के लिए प्रेरित कर सकती है।

इस मामले में कर्मचारियों का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। निजी पोर्ट में उच्च स्तर का मशीनीकरण और ऑटोमेशन होने के कारण समान मात्रा के कार्गो संचालन के लिए कर्मचारियों की संख्या सरकारी व्यवस्था से अलग हो सकती है। इसलिए केवल कर्मचारियों की संख्या के आधार पर किसी पोर्ट की दक्षता या आर्थिक प्रदर्शन का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इसके लिए प्रति कर्मचारी कार्गो, प्रति बर्थ उत्पादकता, जहाज टर्नअराउंड टाइम, परिचालन लागत, राजस्व, EBITDA और पूंजी निवेश जैसे कई संकेतकों की तुलना करनी होगी।

इसी तरह यह कहना भी अभी सीधे तौर पर सही नहीं होगा कि विशाखापट्टनम पोर्ट घाटे में चल रहा है या अडानी उसे निश्चित रूप से पीछे छोड़ देगा। उपलब्ध आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि Visakhapatnam Port Authority ने FY2024-25 में रिकॉर्ड 82.62 मिलियन टन कार्गो संभाला है और खुद 90 मिलियन टन के अगले लक्ष्य की बात कर रहा है। इसलिए इसकी स्थिति को केवल प्रतिस्पर्धा के दबाव के आधार पर कमजोर मानना आंकड़ों के अनुरूप नहीं होगा।

दूसरी तरफ अडानी पोर्ट्स के पूरे नेटवर्क का पैमाना भी तेजी से बढ़ा है। कंपनी ने FY2024-25 में अपने पोर्ट नेटवर्क पर 450 मिलियन टन कार्गो संभालने की जानकारी दी है और कंटेनर कार्गो में भी मजबूत वृद्धि दर्ज की।

विशाखापट्टनम में इसलिए आने वाले वर्षों की तस्वीर बेहद महत्वपूर्ण है। यदि सरकारी पोर्ट अपनी मौजूदा क्षमता के साथ आधुनिक तकनीक, डिजिटल सिस्टम, तेज कार्गो evacuation, बेहतर रेल कनेक्टिविटी और प्रतिस्पर्धी शुल्क व्यवस्था को मजबूत करता है, तो वह अपनी ऐतिहासिक स्थिति को और मजबूत कर सकता है। वहीं गंगावरम पोर्ट गहरे पानी, बड़े जहाजों और अत्यधिक मशीनीकरण के सहारे अपने कार्गो आधार का विस्तार करता है तो समुद्री कारोबार में प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है।

यहां एक और महत्वपूर्ण बात समझनी होगी। विशाखापट्टनम पोर्ट और अडानी का गंगावरम पोर्ट एक ही पोर्ट नहीं हैं। दोनों अलग-अलग बंदरगाह हैं। गंगावरम विशाखापट्टनम के दक्षिण में स्थित है और अडानी पोर्ट्स के नेटवर्क का हिस्सा है। हालांकि दोनों का भौगोलिक क्षेत्र और कई hinterland बाजार आपस में जुड़े होने के कारण कार्गो के लिए प्रतिस्पर्धा की स्थिति बन सकती है। अडानी के पास विशाखापट्टनम पोर्ट में Adani Vizag Coal Terminal से जुड़ी उपस्थिति भी रही है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल सरकारी और निजी क्षेत्र की भूमिका से जुड़ा है। भारत सरकार के अधीन आने वाला विशाखापट्टनम पोर्ट देश की समुद्री संपत्ति है और इसके विकास में सार्वजनिक निवेश, जमीन, बुनियादी ढांचा तथा वर्षों का संस्थागत अनुभव शामिल है। वहीं निजी कंपनियां पूंजी, तकनीक, ऑटोमेशन और व्यावसायिक संचालन के जरिए अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ा रही हैं।

ऐसे में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि सरकारी पोर्ट या निजी पोर्ट में से कौन जीतेगा। असली सवाल यह है कि विशाखापट्टनम क्षेत्र का समुद्री कारोबार किस मॉडल से देश और स्थानीय अर्थव्यवस्था को ज्यादा फायदा पहुंचाएगा। कार्गो बढ़े, जहाजों का टर्नअराउंड समय घटे, लॉजिस्टिक्स लागत कम हो, स्थानीय उद्योगों को बेहतर कनेक्टिविटी मिले, रोजगार के अवसर बढ़ें और सरकारी संपत्तियों का अधिकतम उपयोग हो—इन मानकों पर दोनों व्यवस्थाओं को परखा जाना आने वाले समय में अधिक महत्वपूर्ण होगा।

विशाखापट्टनम की समुद्री कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। 1933 में शुरू हुआ यह पोर्ट आज 8.26 करोड़ टन से अधिक वार्षिक कार्गो संभालने की स्थिति तक पहुंच चुका है। दूसरी ओर उसी समुद्री क्षेत्र में अडानी का गंगावरम पोर्ट गहरे पानी और आधुनिक तकनीक के सहारे तेजी से अपनी जगह बना रहा है। आने वाले वर्षों में दोनों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा केवल दो पोर्टों की कहानी नहीं होगी, बल्कि यह तय करेगी कि पूर्वी तट पर भारत का समुद्री लॉजिस्टिक्स मॉडल कितना आधुनिक, प्रतिस्पर्धी और रोजगारपरक बनता है।

विशाखापट्टनम के लिए चुनौती साफ है—पुरानी विरासत और विशाल सरकारी ढांचे को आधुनिक तकनीक और तेज कारोबारी फैसलों के साथ जोड़ना। यदि ऐसा हुआ तो 1933 में शुरू हुआ यह बंदरगाह आने वाले दशकों में भी पूर्वी तट का प्रमुख समुद्री द्वार बना रह सकता है; और यदि प्रतिस्पर्धा की गति के साथ आधुनिकीकरण नहीं हुआ तो निजी गहरे पानी वाले बंदरगाहों के बढ़ते प्रभाव से सरकारी पोर्ट पर दक्षता और ग्राहक सेवा को लेकर दबाव बढ़ना स्वाभाविक होगा।

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