-ः ललित गर्ग:-
रक्षाबंधन केवल कलाई पर बंधा हुआ एक धागा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस विराट चेतना का प्रतीक है जिसमें प्रेम, विश्वास, दायित्व, आत्मीयता और संरक्षण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। लेकिन बदलते समय में इस पर्व के अर्थ को भी नए सिरे से समझने की जरूरत है। वह समय बीत चुका है जब स्त्री की सुरक्षा को केवल पुरुष की जिम्मेदारी मान लिया जाता था। आज की महिला स्वयं अपने जीवन की दिशा तय कर रही है, शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, राजनीति, सेना, उद्योग, खेल और अंतरिक्ष तक अपनी पहचान बना रही है। इसलिए आज राखी का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि भाई बहन की रक्षा करेगा या नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि क्या हमारा समाज ऐसा बनेगा जिसमें हर महिला को अपनी सुरक्षा, स्वतंत्रता, गरिमा और सपनों के लिए किसी की कृपा पर निर्भर न रहना पड़े? रक्षाबंधन की भारतीय अवधारणा में ‘रक्षा’ का अर्थ बहुत व्यापक है। संस्कृत में कहा गया है- “रक्षति इति रक्षः”, अर्थात जो रक्षा करे वही रक्षक है। परंतु किसकी रक्षा? केवल शरीर की नहीं, बल्कि सम्मान की, स्वतंत्रता की, संस्कारों की, विचारों की और जीवन-मूल्यों की भी। इसी व्यापक अर्थ में रक्षाबंधन आज एक पारिवारिक पर्व से आगे बढ़कर सामाजिक दर्शन का पर्व बन सकता है।
भारतीय परंपरा में रक्षासूत्र का उल्लेख अत्यंत प्राचीन है। वैदिक परंपरा में रक्षा-सूत्र को मंगल, संकल्प और संरक्षण का प्रतीक माना गया। इंद्र और इंद्राणी की कथा हो अथवा गुरु द्वारा शिष्य को रक्षासूत्र बांधने की परंपरा-इन सबमें एक गहरी भावना दिखाई देती है कि मनुष्य अपने से जुड़े व्यक्ति के प्रति उत्तरदायित्व स्वीकार करे। इसका अर्थ किसी को कमजोर मानकर उसकी रक्षा करना नहीं, बल्कि संबंधों को जिम्मेदारी से निभाना है। यही बात आज के रक्षाबंधन को नई अर्थवत्ता देती है। भारतीय इतिहास में राखी ने कई बार रक्त और धर्म से परे मानवीय संबंधों का रूप लिया है। राजपूत परंपरा में युद्ध के लिए जाते योद्धाओं की कलाई पर रक्षासूत्र बांधने की परंपरा वीरता और विजय की मंगलकामना से जुड़ी रही। मध्यकालीन इतिहास में मेवाड़ की रानी कर्णावती और हुमायूँ से जुड़ी राखी की कथा भले ही इतिहास और लोकस्मृति के बीच अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत की जाती हो, लेकिन इसका सांस्कृतिक संदेश स्पष्ट है-राखी जैविक भाई-बहन के रिश्ते से आगे बढ़कर विश्वास और संरक्षण का मानवीय अनुबंध बन सकती है।
महाभारत में द्रौपदी और श्रीकृष्ण का प्रसंग भी इसी भावभूमि को स्पर्श करता है। द्रौपदी द्वारा श्रीकृष्ण की घायल कलाई पर वस्त्र बांधने और श्रीकृष्ण द्वारा उसके सम्मान की रक्षा करने की कथा भारतीय मानस में भाई-बहन के रिश्ते की करुणा, आत्मीयता और दायित्व का प्रतीक बन गई। इस कथा का आधुनिक अर्थ यह है कि संबंध केवल लेने का नहीं, एक-दूसरे के लिए खड़े होने का नाम है। रक्षा एकतरफा नहीं होती, प्रेम में पारस्परिक उत्तरदायित्व होता है। आज की नारी ने इस पारंपरिक धारणा को एक नया आयाम दिया है। वह अब केवल ‘रक्षा की अपेक्षा रखने वाली’ नहीं, बल्कि स्वयं परिवार, समाज और राष्ट्र की रक्षा में सक्रिय भागीदार है। भारतीय सशस्त्र सेनाओं में महिलाएं सीमाओं की सुरक्षा कर रही हैं, महिला पायलट आकाश में देश की शक्ति का प्रतिनिधित्व कर रही हैं, वैज्ञानिक अंतरिक्ष अभियानों में योगदान दे रही हैं, महिला खिलाड़ी विश्व मंच पर तिरंगा ऊंचा कर रही हैं और प्रशासनिक सेवाओं में महिलाएं नीति-निर्माण को दिशा दे रही हैं। ऐसे समय में राखी का धागा हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि जिस नारी को हम ‘अबला’ कहकर उसकी रक्षा का दावा करते हैं, वही नारी राष्ट्र की रक्षा में अपना जीवन समर्पित कर सकती है तो उसके सम्मान और अधिकारों की रक्षा में समाज पीछे क्यों रहे?
यही रक्षाबंधन का नया दर्शन है-नारी की रक्षा नहीं, नारी की सामर्थ्य का सम्मान। नारी को सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी उपाय उसकी स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता को बदलना है। बेटी को यह कहना कि ‘सावधान रहना, क्योंकि दुनिया सुरक्षित नहीं है’ पर्याप्त नहीं। उससे अधिक जरूरी है बेटे को यह सिखाना कि किसी महिला की स्वतंत्रता, गरिमा और इच्छा का सम्मान करना ही वास्तविक पुरुषार्थ है। राखी यदि भाई की कलाई पर बंधती है तो वह केवल बहन की रक्षा का वचन न बने, वह भाई को यह संकल्प भी दे कि वह किसी भी स्त्री के प्रति अन्याय, अपमान और हिंसा के विरुद्ध खड़ा होगा। आज नारी सुरक्षा का प्रश्न केवल सड़क, कार्यस्थल या सार्वजनिक स्थानों तक सीमित नहीं है। डिजिटल युग ने सुरक्षा की नई चुनौतियां पैदा की हैं। साइबर उत्पीड़न, ऑनलाइन बदनामी, निजी तस्वीरों का दुरुपयोग, डिजिटल धोखाधड़ी और सोशल मीडिया पर महिलाओं के विरुद्ध अपमानजनक व्यवहार आधुनिक समाज के नए खतरे हैं। इसलिए आज की राखी में एक नया संकल्प जुड़ना चाहिए-हम नारी की डिजिटल गरिमा की भी रक्षा करेंगे। लेकिन रक्षा का एक और आयाम है, जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं-आर्थिक आत्मनिर्भरता। जिस महिला के पास शिक्षा, कौशल, रोजगार और आर्थिक निर्णय लेने की क्षमता है, उसकी आत्मसम्मान की शक्ति कहीं अधिक होती है। इसलिए यदि रक्षाबंधन को सचमुच नारी-सशक्तीकरण का पर्व बनाना है तो भाई बहन को केवल उपहार न दे, बल्कि उसके सपनों में सहभागी बने। उसकी शिक्षा, व्यवसाय, शोध, कला, करियर अथवा सामाजिक कार्य में सहयोग करे। सबसे सुंदर राखी वही होगी जो बहन की कलाई पर बंधकर उसके सपनों को पंख दे।
भारतीय संस्कृति ने नारी को केवल संरक्षण की वस्तु नहीं माना। हमारे यहां “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” की भावना रही है। गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों ने ज्ञान की परंपरा में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई। रानी लक्ष्मीबाई ने रणभूमि में अद्भुत शौर्य का परिचय दिया। अहिल्याबाई होल्कर ने शासन और लोककल्याण का आदर्श स्थापित किया। सावित्रीबाई फुले ने स्त्री-शिक्षा की मशाल जलाई। आधुनिक भारत में कल्पना चावला से लेकर अनेक महिला वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष यात्रियों तक ने यह सिद्ध किया कि प्रतिभा का कोई लिंग नहीं होता। इसलिए रक्षाबंधन को अतीत की स्मृति और वर्तमान की चेतना के बीच एक सेतु बनाना होगा। हमारी संस्कृति का संरक्षण तभी सार्थक है जब वह जीवन को आगे बढ़ाए, उसे पीछे न खींचे। परंपरा वह नहीं जो केवल दोहराई जाए, परंपरा वह है जो समय के साथ नए अर्थ पैदा करे। रक्षाबंधन का आध्यात्मिक पक्ष भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। संसार में सबसे बड़ी असुरक्षा बाहरी नहीं, भीतर की है। भय, क्रोध, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष मनुष्य की आत्मिक शांति को कमजोर करते हैं। जैन दर्शन की दृष्टि से देखें तो वास्तविक रक्षा बाहरी कवच से नहीं, आत्मसंयम और आत्मजागरण से होती है। जब मनुष्य अपने भीतर के विकारों से स्वयं की रक्षा करना सीख जाता है, तभी वह दूसरों के लिए भी सुरक्षा और शांति का माध्यम बनता है। इस दृष्टि से रक्षासूत्र हमारी कलाई पर नहीं, पहले हमारे विवेक पर बंधना चाहिए।
रक्षाबंधन हमें यह भी याद दिलाता है कि राष्ट्र केवल सीमाओं से सुरक्षित नहीं होता। राष्ट्र तब सुरक्षित होता है जब उसकी बेटियां सुरक्षित हों, जब परिवारों में विश्वास हो, जब समाज में संवेदना हो, जब युवाओं में चरित्र हो और जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें। सीमा पर सैनिक राष्ट्र की भौगोलिक रक्षा करता है, लेकिन घर-परिवार में संस्कार, शिक्षा और संवेदना राष्ट्र की सामाजिक रक्षा करते हैं। माता-पिता संकल्प लें कि बेटा और बेटी दोनों को समान अवसर देंगे। रक्षाबंधन का भविष्य उस मानसिक परिवर्तन में है जहां रक्षा का अर्थ अधिकार छीनना नहीं, अधिकार सुरक्षित करना होगा, प्रेम का अर्थ स्वामित्व नहीं, स्वतंत्रता का सम्मान होगाय भाईचारे का अर्थ संरक्षण नहीं, साझेदारी होगा और संस्कृति का अर्थ अतीत में लौटना नहीं, अपने श्रेष्ठ मूल्यों को भविष्य में ले जाना होगा। कलाई पर बंधी राखी कुछ दिनों में पुरानी पड़ सकती है, लेकिन उससे जुड़ा संकल्प यदि जीवन में उतर जाए तो वह पीढ़ियों तक जीवित रहता है। इसलिए इस रक्षाबंधन पर एक नया संकल्प हो-नारी को सुरक्षित ही नहीं, सम्मानित बनाएंगे। उसे संरक्षित ही नहीं, समर्थ बनाएंगे। उसके रास्ते रोकेंगे नहीं, उसके सपनों के साथ चलेंगे। यही राखी का नया अर्थ है, यही भारतीय संस्कृति की आधुनिक व्याख्या है और यही उस धागे की वास्तविक शक्ति है, जो एक कलाई से शुरू होकर पूरे समाज को मानवीयता, आत्मसम्मान और राष्ट्रभावना के सूत्र में बांध सकता है।

राखी कोरा रक्षा कवच नहीं, नारी-सम्मान का संकल्प बने
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