-संजय सक्सेना
दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक, आज देश की सड़कों पर एक नई और गंभीर सुगबुगाहट साफ सुनाई दे रही है। यह वह आवाज़ है जो सामान्य श्रेणी के उन छात्रों और युवाओं की है, जिन्हें लगता है कि व्यवस्था के पैमाने पर उनकी योग्यता और उनके अधिकारों की अनदेखी की जा रही है। लेकिन इस आंदोलन का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि सत्ता और विपक्ष के बड़े सियासी गलियारों में इन युवाओं की आवाज़ सुनने के बजाय इन्हें या तो नजरअंदाज किया जा रहा है या फिर अपने राजनीतिक नफा-नुकसान के चश्मे से देखा जा रहा है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य दल इस पर खुलकर बात करने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि उनका पारंपरिक वोट बैंक खिसक न जाए। जब भी आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा होती है, राजनीतिक दलों की प्राथमिकता जनहित या सामाजिक न्याय के समग्र संतुलन से ज्यादा चुनावी समीकरणों को साधना बन जाती है। आज़ादी के बाद से ही आरक्षण को राजनीतिक दलों ने एक अचूक चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है।अधिकांश सियासी दल यह मानते हैं कि किसी एक वर्ग विशेष के पक्ष में खुलकर बोलने से उनका बड़ा सामाजिक आधार प्रभावित हो सकता है। इसीलिये युवाओं की वास्तविक और तार्किक चिंताओं को सुनने के बजाय उन्हें राजनीतिक दलों द्वारा केवल विरोधियों पर हमला करने का माध्यम बना लिया जाता है। जब युवा जंतर-मंतर पर सुधार की मांग करते हैं, तो नेताओं द्वारा उनकी उपेक्षा करना यह दिखाता है कि व्यवस्था बदलाव के उस दौर से डरती है जो पारंपरिक समीकरणों को हिला सकता है। जबकि यह वह सुलगती हुई आग है, जिसमें इतिहास गवाह है कि जिसने भी अपनी रोटियां सेंकने की कोशिश की, उसके हाथ अंततः जले ही हैं। इस सामाजिक असंतोष को नजरअंदाज करना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए हितकर नहीं हो सकता।
गौरतलब है, देश को आजादी मिलने के बाद जब संविधान का निर्माण हो रहा था और आरक्षण व्यवस्था की नींव रखी जा रही थी, तब देश के मनीषियों और हमारे संविधान निर्माताओं के मन में एक स्पष्ट और पवित्र उद्देश्य था। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर और अन्य निर्माताओं ने इस बात पर जोर दिया था कि सदियों से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से वंचित रहे वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए उनको आरक्षण की आवश्यकता है। संविधान सभा की बहसों के दौरान यह स्पष्ट किया गया था कि यह व्यवस्था देश के वंचित और शोषित तबके को बराबरी का हक दिलाने के लिए एक सीढ़ी का काम करेगी। इसे देश में सामाजिक समरसता और भाईचारा मजबूत करने का जरिया माना गया था, न कि हमेशा के लिए स्थायी और वंशानुगत विशेषाधिकार और यह उम्मीद की गई थी कि जैसे-जैसे समाज आगे बढ़ेगा, आर्थिक और सामाजिक असमानता कम होगी और राष्ट्र अधिक समावेशी बनेगा, तब आरक्षण की जरूरत नहीं बचेगी, लेकिन समय के साथ, इस महान परिकल्पना का धरातल पर रूप बदल गया। आज की कड़वी सच्चाई यह है कि आरक्षण का एक बड़ा हिस्सा उस वर्ग तक आसानी से पहुंच रहा है जो पहले से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से सक्षम हो चुका है, जबकि उसी वंचित समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े असल जरूरतमंद व्यक्ति तक आज भी मूलभूत सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं।
यही बात जंतर-मंतर और लखनऊ की सड़कों पर संघर्ष कर रहे सामान्य वर्ग के छात्र और युवा बार-बार स्पष्ट कर रहे हैं कि वे आरक्षण व्यवस्था को पूरी तरह खत्म करने की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे इसमें पारदर्शी और तार्किक सुधार चाहते हैं। इन आंदोलनरत छात्रों और युवाओं की कुछ अपनी मुख्य चिंताएं और सवाल हैं। सरकार द्वारा सवर्ण जातियों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए जो दस प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है, उसे युवा ऊंट के मुंह में जीरा बताते हैं। उनकी मांग है कि आर्थिक मानदंड ही हर वर्ग के लिए न्याय का मुख्य आधार होना चाहिए। एक तरफ सामान्य श्रेणी का एक गरीब रिक्शा चालक या मजदूर का बेटा अपनी प्रतिभा के दम पर भी संघर्ष करने को मजबूर है, वहीं दूसरी तरफ दलित या पिछड़े वर्ग के संपन्न परिवारों जैसे बड़े-बड़े सरकारी अधिकारी, राजनेता, डॉक्टर और इंजीनियर के बच्चे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आरक्षण का पूरा लाभ उठा रहे हैं। युवाओं का यह सवाल पूरी तरह तार्किक है कि यदि किसी जरूरतमंद की मदद के नाम पर बनाई गई व्यवस्था का लाभ केवल संपन्न घराने उठाने लगें, तो सामान्य वर्ग के गरीब युवाओं के मौलिक अधिकारों की अनदेखी क्यों की जा रही है? लेकिन जातिवाद की राजनीति करने वाले कुछ दल और नेताओं के लिये यह सब मायने नहीं रखता है। सामान्य वर्ग के आरक्षण के खिलाफ आंदोलन के आग में मोदी और बीजेपी की राज्य सरकारों के ‘हाथ’ भी झुलसते दिख रहे हैं, लेकिन इस आंदोलन को भड़काने का आरोप भी इसी दल पर लग रहा है। इसी से बीजेपी के नेता बेचैन हैं। वह 2021 के बिहार विधान सभा चुनाव में आरक्षण को लेकर विपक्ष द्वारा फैलाये गये नैरेटिव का नुकसान देख चुके हैं।
कुल मिलाकर आज देश के बड़े नेताओं, जैसे राहुल गांधी, अखिलेश यादव और सत्ता पक्ष के दिग्गजों को यह समझने की जरूरत है कि सामाजिक न्याय की परिभाषा केवल जातियों के आंकड़ों और चुनावी मंचों तक सीमित नहीं रह सकती है। यह नेता अपने संकीर्ण राजनीतिक चश्मे को उतारकर बड़ा दिल दिखाएं और यह स्वीकार करें कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में सुधार की सख्त आवश्यकता है। इस बात की गंभीरता से समीक्षा होनी चाहिए कि आरक्षण का लाभ वाकई अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है या नहीं। इसके साथ-साथ क्रीमी लेयर के नियमों को भी और अधिक सख्त और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए ताकि हर वर्ग के केवल वास्तव में जरूरतमंद और गरीब युवाओं को ही इसका संबल मिल सके। यदि समय रहते इस दिशा में ईमानदारी से विचार नहीं किया गया, तो यह असंतोष और अधिक गहरा सकता है। किसी भी राष्ट्र की सच्ची प्रगति तभी संभव है जब उसका हर एक युवा यह महसूस करे कि उसके साथ न्याय हो रहा है और उसकी मेहनत का पूरा सम्मान सुरक्षित है।



