चेहरा नहीं, काम और काबिलियत देखकर चुनें शहर की सरकार

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राजेश जैन
राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों का बिगुल बज चुका है। राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव कार्यक्रम जारी कर दिया है और संबंधित शहरी क्षेत्रों में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। इस बार प्रदेश के 309 निकायों में चुनाव होंगे। इनमें 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगरपालिकाएं शामिल हैं। कुल 10,245 वार्डों में करीब 1 करोड़ 44 लाख मतदाता अपने प्रतिनिधि चुनेंगे। ये आंकड़े सिर्फ चुनाव की विशालता नहीं बताते, बल्कि लोकतंत्र की एक बड़ी जिम्मेदारी भी सामने रखते हैं।

लोकसभा चुनाव में हम देश की दिशा चुनते हैं, विधानसभा चुनाव में प्रदेश की सरकार। लेकिन नगर निकाय चुनाव हमारे रोजमर्रा के जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं। इसमें हम अपने शहर या कस्बे का रोजमर्रा का जीवन तय करने वाले लोगों को चुनते हैं। सड़क कब बनेगी, कचरा कितनी नियमितता से उठेगा, नाली जाम होगी या नहीं, बारिश में जलभराव कितना होगा, स्ट्रीट लाइट जलेगी या नहीं, पार्क सुरक्षित रहेंगे या नहीं, फुटपाथ बनेंगे या उन पर अतिक्रमण होगा। …ऐसे ही सवालों का सीधा संबंध स्थानीय शासन से है। इसलिए इस चुनाव में सबसे जरूरी सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन जीत रहा है? सवाल यह होना चाहिए कि जीतने वाला हमारे शहर के लिए करेगा क्या?

जाति और गुट से ऊपर उठकर चुनें अपना प्रतिनिधि

स्थानीय चुनावों की राजनीति अक्सर बेहद व्यक्तिगत होती है। यहां उम्मीदवार रिश्तेदार, पड़ोसी, परिचित या किसी सामाजिक समूह से जुड़ा व्यक्ति हो सकता है। यही वजह है कि जातीय समीकरण, व्यक्तिगत संबंध और स्थानीय गुटबाजी कई बार उम्मीदवार की योग्यता और काम पर भारी पड़ जाते हैं।

लेकिन हमको एक बात याद रखनी होगी कि सड़क जाति देखकर नहीं टूटती, नाली धर्म देखकर जाम नहीं होती और कचरा किसी एक समुदाय की समस्या नहीं है। पानी की कमी पूरे मोहल्ले को परेशान करती है और जलभराव का पानी हर घर के सामने जमा हो सकता है।

इसलिए वोट भी ऐसे मुद्दों को ध्यान में रखकर होना चाहिए, जो पूरे वार्ड और शहर की जिंदगी को प्रभावित करते हैं।

बदल चुके हैं स्थानीय चुनाव के मुद्दे

कभी नगर निकाय चुनाव का मतलब सड़क, नाली और सफाई तक सीमित माना जाता था। आज शहरों की समस्याएं कहीं ज्यादा जटिल हैं। बढ़ती आबादी, ट्रैफिक, पार्किंग, प्रदूषण, जल संरक्षण, सीवरेज, कचरा प्रबंधन, सार्वजनिक परिवहन, फुटपाथ, स्ट्रीट लाइट, डिजिटल नागरिक सेवाएं और महिलाओं की सुरक्षा भी स्थानीय शासन की प्राथमिकताएं हैं।

शहर तेजी से फैल रहे हैं। नई कॉलोनियां बन रही हैं, आबादी बढ़ रही है और पुराने शहरों पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में केवल गड्ढा भरने या नाली साफ कराने वाला प्रतिनिधि पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत ऐसे प्रतिनिधि की है, जो शहर की अगली दस-पंद्रह साल की जरूरतों को समझता हो।

चुनाव आते ही वादों की बारिश शुरू होगी। कोई सड़क बनवाने का वादा करेगा, कोई नाली, कोई पार्क और कोई नई सुविधा का। लेकिन मतदाता को वादे सुनकर खुश होने के बजाय कुछ बुनियादी सवाल पूछने चाहिए।

उम्मीदवार से पूछा जाना चाहिए कि वह जलभराव रोकने की क्या योजना रखता है? कचरा प्रबंधन कैसे सुधारेगा? पार्किंग और ट्रैफिक की समस्या पर उसका क्या विचार है? वार्ड में सार्वजनिक स्थानों को कैसे बचाएगा? महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए शहर को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने की उसकी योजना क्या है?

उम्मीदवार से पूछिए-आप करेंगे क्या और कैसे?

यह भी पूछें कि काम के लिए पैसा कहां से आएगा? प्राथमिकता क्या होगी? समय सीमा क्या होगी? जिम्मेदारी किसकी होगी? नगर निकाय के पास उस काम का अधिकार और बजट है भी या नहीं?

यह सवाल इसलिए भी जरूरी हैं, क्योंकि चुनावी वादों और प्रशासनिक अधिकारों में अंतर होता है। हर समस्या का समाधान पार्षद अकेले नहीं कर सकता। लेकिन एक सक्षम प्रतिनिधि समस्या को सही विभाग तक पहुंचाने, बजट दिलाने और काम की निगरानी करने की क्षमता जरूर रखता है। यही फर्क एक सक्रिय पार्षद और केवल नाम के जनप्रतिनिधि के बीच होता है।

जनता के लिए क्या है आचार संहिता का मतलब?

चुनाव कार्यक्रम घोषित होते ही आचार संहिता लागू हो गई है। संबंधित शहरी क्षेत्रों में नए विकास कार्यों की घोषणा, नए वर्क ऑर्डर और नए प्रोजेक्ट शुरू करने पर रोक रहेगी। हालांकि पहले से स्वीकृत और चल रहे विकास कार्य जारी रह सकते हैं।

इसका मतलब यह भी है कि चुनाव के दौरान किए जाने वाले विकास संबंधी दावों को मतदाता सावधानी से देखे। जो काम पहले से स्वीकृत है, उसे चुनावी उपलब्धि बताकर पेश किया जा सकता है; जो काम वास्तव में नया है, उसकी स्थिति अलग होगी। जागरूक मतदाता को दोनों के बीच अंतर समझना चाहिए।

केवल मतदान तक न रहे महिलाओं और युवाओं की भागीदारी

स्थानीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन प्रतिनिधित्व का अर्थ केवल सीट पर पहुंचना नहीं है। जरूरी है कि निर्वाचित महिला प्रतिनिधि वास्तविक निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाएं।

इसी तरह युवाओं की भूमिका सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट, चुनाव प्रचार और नारे लगाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। शहर की नीतियों, बजट, विकास योजनाओं और सार्वजनिक सुविधाओं को लेकर युवाओं को सवाल पूछने चाहिए। आखिर अगले दस-पंद्रह वर्षों का शहर उन्हें ही संभालना है।

चुनाव के बाद असली परीक्षा शुरू होगी

हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक बड़ी समस्या यह है कि मतदान के बाद नागरिक अपनी जिम्मेदारी खत्म मान लेता है। चुनाव के दिन वोट डालकर पांच साल तक शिकायत करना लोकतंत्र नहीं है।

जनप्रतिनिधि चुनने के बाद नागरिकों को उससे नियमित संवाद करना चाहिए। वार्ड की समस्याओं पर लिखित शिकायत करनी चाहिए, विकास कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठाने चाहिए और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल पर नजर रखनी चाहिए।

लोकतंत्र केवल वोट देने तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र का असली अर्थ है-सवाल पूछना, जवाब मांगना और जरूरत पड़ने पर जवाबदेही तय करना।

बहरहाल, मतदाताओं के सामने इस बार बड़ा अवसर है। वे केवल पार्षद नहीं चुनेंगे, बल्कि अपने शहरों की प्राथमिकताएं तय करेंगे।

अच्छा शहर केवल सरकार नहीं बनाती। अच्छा शहर जागरूक नागरिक और जवाबदेह जनप्रतिनिधि मिलकर बनाते हैं। इसलिए वोट जरूर दें, लेकिन केवल चेहरा देखकर नहीं। जाति देखकर नहीं। रिश्तेदारी देखकर नहीं। पार्टी के नाम पर आंख बंद करके नहीं। उम्मीदवार का पिछला काम देखिए। उसका व्यवहार देखिए। उसकी समझ देखिए। उसके वादों की व्यवहारिकता देखिए और सबसे महत्वपूर्ण-यह देखिए कि क्या वह चुनाव जीतने के बाद भी आपके सवालों के सामने खड़ा रहेगा?

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