यूरेनियम डील से ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता भारत

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-महेन्द्र तिवारी
दुनिया इस समय ऊर्जा परिवर्तन के सबसे महत्वपूर्ण दौर से गुजर रही है। एक ओर जलवायु परिवर्तन की चुनौती देशों को कोयले और पेट्रोलियम जैसे पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम करने के लिए मजबूर कर रही है, तो दूसरी ओर तेजी से बढ़ती आबादी, औद्योगीकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहनों और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार ने बिजली की मांग को अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचा दिया है। ऐसे समय में परमाणु ऊर्जा एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था के केंद्र में आ गई है। अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और कई अन्य देश अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों का विस्तार कर रहे हैं। इसी वैश्विक परिदृश्य के बीच भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम आपूर्ति समझौते पर अंतिम मुहर लगना केवल एक व्यापारिक सौदा नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और भविष्य की विकास यात्रा से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। भारत ने वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता विकसित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्तमान क्षमता की तुलना में यह कई गुना अधिक है और इसे हासिल करने के लिए नए परमाणु बिजलीघरों का निर्माण, आधुनिक रिएक्टरों की स्थापना और दीर्घकालिक ईंधन आपूर्ति आवश्यक होगी। सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि परमाणु ऊर्जा भारत के स्वच्छ ऊर्जा भविष्य का प्रमुख आधार बनेगी तथा इसे विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ा गया है। यहीं पर ऑस्ट्रेलिया का महत्व सामने आता है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े ज्ञात यूरेनियम भंडार वाले देशों में गिना जाता है। लंबे समय तक वहां से भारत को यूरेनियम निर्यात का मार्ग विभिन्न नीतिगत और कानूनी कारणों से अवरुद्ध रहा, लेकिन अब प्रशासनिक व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिए जाने के बाद भारत को वहां से दीर्घकालिक और विश्वसनीय ईंधन आपूर्ति का रास्ता खुल गया है। इससे भारत की नागरिक परमाणु परियोजनाओं को स्थिर ईंधन उपलब्ध होगा और भविष्य में बनने वाले नए रिएक्टरों को भी आवश्यक संसाधन मिल सकेंगे। भारत के लिए यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में प्राकृतिक यूरेनियम के सीमित भंडार हैं। भारत ने घरेलू स्तर पर यूरेनियम की खोज और उत्पादन बढ़ाने के प्रयास अवश्य किए हैं, लेकिन बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को देखते हुए केवल घरेलू संसाधनों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को लगातार ईंधन चाहिए और यदि आपूर्ति बाधित हो जाए तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया जैसा भरोसेमंद साझेदार भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नया आधार प्रदान करता है। भारत का परमाणु कार्यक्रम हमेशा शांतिपूर्ण उपयोग पर आधारित रहा है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह विश्वास कायम किया है कि वह असैन्य परमाणु ईंधन का उपयोग केवल ऊर्जा उत्पादन और अन्य नागरिक उद्देश्यों के लिए करेगा। यही कारण है कि आज अनेक देश भारत के साथ परमाणु क्षेत्र में सहयोग करने के लिए तैयार हैं। ऑस्ट्रेलिया के साथ हुआ यह समझौता भी इसी भरोसे का परिणाम माना जा रहा है।ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। आने वाले वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर उद्योग, इलेक्ट्रिक वाहन, हाई स्पीड रेल, स्मार्ट शहर और डिजिटल अवसंरचना के विस्तार के कारण बिजली की मांग कई गुना बढ़ने वाली है। सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार तेजी से हो रहा है, लेकिन इनकी सबसे बड़ी सीमा यह है कि इनका उत्पादन मौसम पर निर्भर रहता है। सूर्य न होने या हवा कम चलने पर उत्पादन घट जाता है। इसके विपरीत परमाणु ऊर्जा चौबीसों घंटे निरंतर बिजली उपलब्ध कराती है। यही कारण है कि विकसित देश भी नवीकरणीय ऊर्जा के साथ परमाणु ऊर्जा को समानांतर रूप से आगे बढ़ा रहे हैं। वास्तव में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुआ यह यूरेनियम समझौता केवल दो देशों के बीच ईंधन का लेनदेन नहीं है। यह ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक विकास, वैज्ञानिक प्रगति, रणनीतिक साझेदारी और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उठाया गया दूरदर्शी कदम है। आने वाले वर्षों में जब भारत अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का तेजी से विस्तार करेगा, तब इस समझौते का महत्व और अधिक स्पष्ट दिखाई देगा। यह सौदा भारत को केवल बिजली उत्पादन के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति और स्वच्छ विकास की दिशा में भी अधिक आत्मविश्वास और मजबूती के साथ आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करेगा।

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