तेल संकट की आंच में झुलसती भारतीय अर्थव्यवस्था

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-महेन्द्र तिवारी
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में पैदा हुए संकट ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच टकराव ने जिस तरह वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है, उसका असर अब केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। तेल और गैस की सप्लाई पर संकट गहराने से दुनिया भर के देशों की आर्थिक व्यवस्था दबाव में आ गई है। सबसे अधिक चिंता उन देशों को है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं। भारत भी उन्हीं देशों में शामिल है। भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ते ही भारतीय अर्थव्यवस्था पर उसका सीधा असर दिखाई देने लगता है। हाल के दिनों में कई वैश्विक एजेंसियों और आर्थिक संस्थानों ने चेतावनी दी है कि यदि पश्चिम एशिया का तनाव लंबे समय तक जारी रहा तो भारत के लिए आर्थिक हालात मुश्किल हो सकते हैं।

रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने अपनी रिपोर्ट “ऑयल्स नॉट वेल” में स्पष्ट कहा है कि वित्त वर्ष 2027 में भारत का तेल व्यापार घाटा खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है। रिपोर्ट के अनुसार भारत की बढ़ती आयात निर्भरता, कमजोर पड़ते पेट्रोलियम निर्यात और लगातार महंगे हो रहे कच्चे तेल के कारण बाहरी आर्थिक संतुलन बिगड़ने की आशंका है। क्रिसिल का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत 90 से 95 डॉलर प्रति बैरल के बीच रह सकती है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह औसत लगभग 70.3 डॉलर प्रति बैरल था। यह अंतर अपने आप में बताता है कि भारत के आयात बिल पर कितना अतिरिक्त बोझ बढ़ने वाला है।

भारत के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि घरेलू उत्पादन लगातार मांग के मुकाबले बहुत कम है। पिछले एक दशक में भारत का तेल आयात तेजी से बढ़ा है। वित्त वर्ष 2014 में जहां भारत लगभग 190 मिलियन टन तेल आयात करता था, वहीं वित्त वर्ष 2026 तक यह आंकड़ा 300 मिलियन टन से ऊपर पहुंच गया। इसके उलट रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात लगभग स्थिर बना रहा। कोविड काल के बाद थोड़ी तेजी जरूर आई, लेकिन पिछले दो वित्त वर्षों में निर्यात फिर कमजोर पड़ गया। इसका मतलब यह है कि भारत लगातार ज्यादा तेल खरीद रहा है लेकिन उससे जुड़ी कमाई उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। यही वजह है कि व्यापार घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है।

तेल संकट का असर केवल आयात बिल तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव देश की पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। तेल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है। माल ढुलाई महंगी होती है। उद्योगों का उत्पादन खर्च बढ़ता है। बिजली उत्पादन पर असर पड़ता है। इसका सीधा असर खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर दिखाई देता है। महंगाई बढ़ने लगती है और आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ जाता है। यही कारण है कि आर्थिक विशेषज्ञों ने वित्त वर्ष 2027 में भारत में महंगाई दर 5 प्रतिशत से ऊपर जाने की आशंका जताई है। जब महंगाई बढ़ती है तो रिजर्व बैंक पर ब्याज दरें ऊंची रखने का दबाव बढ़ जाता है और इसका असर निवेश तथा रोजगार पर भी पड़ता है।

भारत की विकास दर पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भारत की जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान में कटौती की है। पहले जहां मजबूत विकास की उम्मीद जताई जा रही थी, वहीं अब वैश्विक ऊर्जा संकट के कारण विकास दर कमजोर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। महंगा तेल उद्योगों की लागत बढ़ा देता है और उपभोक्ताओं की क्रय क्षमता घटा देता है। इससे बाजार की मांग कमजोर होती है और आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ जाती हैं। अगर लंबे समय तक तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं तो सरकार के लिए विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाना कठिन हो जाएगा।

भारत के चालू खाता घाटे पर भी इसका गहरा असर पड़ सकता है। क्रिसिल ने अनुमान लगाया है कि वित्त वर्ष 2027 में भारत का चालू खाता घाटा जीडीपी के 2.2 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह लगभग 0.8 प्रतिशत था। चालू खाता घाटा बढ़ने का अर्थ यह है कि देश से विदेशी मुद्रा का बहिर्गमन तेजी से बढ़ रहा है। इससे रुपये पर दबाव बढ़ता है और विदेशी निवेशकों का भरोसा भी प्रभावित हो सकता है। यदि डॉलर के मुकाबले रुपया और कमजोर होता है तो आयात और महंगा हो जाएगा, जिससे महंगाई का संकट और गहरा सकता है।

एक और चिंता पश्चिम एशिया से आने वाली भारतीयों की कमाई को लेकर भी है। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं और वहां से भारत को हर साल भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा मिलती है। यदि पश्चिम एशिया की अर्थव्यवस्थाएं युद्ध और तेल संकट से प्रभावित होती हैं तो वहां रोजगार और आय पर असर पड़ सकता है। इसका सीधा असर भारत आने वाली विदेशी मुद्रा पर पड़ेगा। इससे भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो सकती है।

हालांकि भारत सरकार स्थिति से निपटने के लिए कई प्रयास कर रही है। रूस, अमेरिका और अफ्रीकी देशों से तेल खरीद बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। रणनीतिक तेल भंडार को मजबूत करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की नीति अपनाई जा रही है ताकि भविष्य में आयात पर निर्भरता कम की जा सके। लेकिन यह बदलाव तुरंत संभव नहीं है। वर्तमान समय में भारत अभी भी वैश्विक तेल बाजार की उठापटक से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।

स्पष्ट है कि पश्चिम एशिया का यह संकट केवल भू राजनीतिक संघर्ष नहीं रह गया है बल्कि यह दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। भारत जैसे विकासशील देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई नियंत्रण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन कैसे बनाए रखें। यदि हालात जल्दी नहीं सुधरे तो आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था को और कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

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