नई दिल्ली। भारत के पूर्व थल सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे ने अपनी नई किताब, सेना की भूमिका, चीन-पाकिस्तान, ऑपरेशन सिंदूर और वैश्विक सुरक्षा हालात पर अपनी राय रखी। इंटरव्यू में जनरल नरवणे ने ‘फोर स्टार डेस्टिनी’ को लेकर हुए विवाद पर खुलकर बात की। विस्तार से पढ़ें जनरल नरवणे का साक्षात्कार…
जवाब : इस किताब में कुल 25 चैप्टर हैं और हर चैप्टर अपने आप में एक अलग कहानी है। इस किताब को लिखने का विचार मुझे तब आया, जब मैंने शशि थरूर की किताब ‘ए वंडरलैंड ऑफ वर्ड्स: अराउंड द वर्ड इन 101 एसेज’ पढ़ी। यह किताब अंग्रेज़ी भाषा, शब्दों और उनके कॉन्सेप्ट्स पर आधारित है। उसे पढ़ने के बाद मेरे मन में आया कि क्यों न मैं भी ऐसी किताब लिखूं, लेकिन फौज से जुड़ी उन अनजानी और दिलचस्प बातों पर, जिनके बारे में आम लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं होती। बस वहीं से इस किताब की शुरुआत हुई।
सवाल : किताब में आपका सबसे पसंदीदा चैप्टर कौन सा है?
जवाब : मेरा सबसे पसंदीदा चैप्टर है ‘चक दे फट्टे’। यह मेरे रेजिमेंट का एक नारा भी है। चाहे खेल-कूद हो या एक-दूसरे का हौसला बढ़ाना हो, उस समय हम ‘चक दे फट्टे’ कहते हैं। आजकल यह शब्द काफी लोकप्रिय हो गया है। इस पर फिल्म भी बनी और आम लोग भी इसका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह शब्द आया कहां से है।
दरअसल, इसका इतिहास सिखों और मुगलों के बीच हुई लड़ाइयों से जुड़ा है। जब सिख सेना मुगलों के कैंप पर हमला करती थी, तो वापसी के समय रास्ते में बने लकड़ी के पुलों के फट्टे उखाड़ लेती थी। ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि मुगल सेना उनका पीछा न कर सके। इसी दौरान वे एक-दूसरे से कहते थे, “चक दे फट्टे,” यानी काम पूरा हो गया। यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। मेरी किताब के सभी चैप्टर इसी तरह के फौजी इतिहास से जुड़े हैं।
सवाल : आपकी किताब ‘फोर स्टार डेस्टिनी’ प्रकाशित नहीं हुई, लेकिन वह विवादों में आ गई। राहुल गांधी उसे संसद में लेकर आए। क्या आप मानते हैं कि वह किताब प्रमाणिक थी?
जवाब : एक लेखक के तौर पर मैं यही कहूंगा कि मैंने उस किताब की फाइनल कॉपी खुद नहीं देखी है। वह कौन सी किताब थी, कहां से आई, उसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। प्रकाशक ने भी साफ कहा है कि इस किताब की कोई कॉपी आधिकारिक रूप से सर्कुलेशन में नहीं है। ऐसे में जो भी बाहर आया, वह कहां से आया, इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं कर सकता।
सवाल : उस किताब की एक लाइन, ‘जो उचित समझो, वो करो,’ पर काफी विवाद हुआ। क्या इस लाइन का गलत मतलब निकाला गया?
जवाब : फौज को ऑपरेशन के दौरान पूरी छूट दी जाती है। इसका मतलब यह होता है कि सरकार को सेना पर पूरा भरोसा है। इस बात को उसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। लेकिन अगर कोई हर चीज को गलत तरीके से देखना चाहता है, जैसे कि (ग्लास आधा खाली है या आधा भरा), तो फिर मैं क्या ही बोलूं।



