लोहिया जयंती : कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

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मशहूर कवि अल्लामा इकबाल की कविता की ये पंक्तियाँ ”कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी” डॉ राम मनोहर लोहिया पर एकदम सटीक बैठती है। लोहिया के कहे गए एक एक शब्द आज भी लोगों की जुबान पर है। भारत में गैर कांग्रेसवाद के जन्मदाता और समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया की आज जयंती है। 23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के अकबरपुर में पैदा हुए डॉ. लोहिया को अपने मौलिक विचारों और सतत जन संघर्ष के लिए आज भी सबसे ज्यादा याद किया जाता है। स्वभाव से अक्खड़ और फक्कड़ डॉ लोहिया अपने रचनात्मक विरोध के लिए देश और दुनिया में जाने जाते हैं। लोहिया एक ऐसे नेता हुए है जिनके विचार आज भी प्रासंगिक है। उनके अनुयायी आज लगभग सभी राजनैतिक दलों में मिल जायेंगे। उनके गैर कांग्रेसवाद के विचारों गूंज आज भी सुनाई देती है। हालाँकि कुछ लोग इसे आज के प्रसंग में गैर भाजपावाद से जोड़ते देर नहीं करते, इसमें कोई सच्चाई प्रतीत नहीं होती।
लोहिया कांग्रेस के विचारों के सख्त विरोधी थे, यह किसी सी छिपा नहीं है। मगर आज के नेताओं की तरह आपसी नफरत और वैमनस्यता के भाव उनके मन में नही थे। कांग्रेस को सत्ताच्युत करने का सपना उन्होंने आजादी के बाद से ही संजोया था। उनका यह सपना आंशिक रूप से 1967 में पूरा हुआ जब देश के अनेक राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनी। डॉ राम मनोहर लोहिया कहते थे लोग मेरी बात सुनेंगे जरूर, शायद मेरे मरने के बाद। लोहिया की मृत्यु के दस साल बाद उनकी बात उनके ही अभिन्न साथी जय प्रकाश नारायण ने सुनी और 1977 में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर लोहिया के गैर कांग्रेसवाद के सपने को साकार किया।
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से सोशलिस्ट पार्टी के सफर में शुरू में जय प्रकाश नारायण का साथ भी उन्हें मिला था। मगर बेहद आदर्शवादी जय प्रकाश का चुनावी राजनीति से जल्द ही मोह भंग हो गया और उन्होंने सर्वोदय आंदोलन की राह पकड़ ली। लोहिया की मृत्यु के दस साल बाद जेपी ने गैर कांग्रेसवाद का झंडा बुलंद पर लोहिया का सपना साकार किया।
डॉ राम मनोहर लोहिया कहते थे लोग मेरी बात सुनेंगे जरूर, शायद मेरे मरने के बाद। लोहिया भ्रष्ट सियासत पर भी हमले से नहीं चूकते थे और कहते थे जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करती। भारत में डॉ राम मनोहर लोहिया एक ऐसे नेता हुए है जिनके विचार आज भी प्रासंगिक है। लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी आज खंड खण्ड स्थिति में है। मगर उनके विचार और सिद्धांतों को मानने वाले आज लगभग हर राजनीतिक पार्टी में है। दुनियांभर में ऐसा उदहारण दूसरा नहीं मिलेगा। भारत में लोहिया के विचार और राजनीति चारों ओर बिखरे हुए हैं। खुद को लोहियावादी मानने या बताने वाले लोग तमाम राजनैतिक दलों में पाए जाते हैं। महात्मा गाँधी का नाम हर नेता अपने भाषण में लेता है। गाँधी के बाद लोहिया ही ऐसे एकमात्र नेता है जिनका समरण आज भी हर नेता करना नहीं भूलता।
लोहिया अपने रचनात्मक विरोध के लिए देशभर में जाने जाते थे। गांधीवादी और पंडित नेहरू के अभिन्न मित्र होने के बावजूद उन्होंने नेहरू की नीतियों का समय समय पर घौर विरोध किया। 1962 में उन्होंने नेहरू के विरुद्ध लोकसभा का चुनाव लड़ा और हारे। बाद में अपने साथियों का अनुरोध स्वीकार करते हुए फरुखाबाद से उप चुनाव लड़ा और लोकसभा में पहुंचे। लोकसभा में पहला अविश्वास प्रस्ताव पेश हुआ। अविश्वास प्रस्ताव के प्रमुख वक्ता डा. राममनोहर लोहिया थे। नब्बे मिनट तक डा. लोहिया धारा प्रवाह हिन्दी में संसद में बोलते रहे। उनकी बात का शीर्षक था – तीन आना बनाम तीन रूपये। लोहिया ने कहा – मेरे प्यारे प्रधानमंत्री नेहरू जी के राज में आम जनता तीन आना से कम पर ही गुजर करती है। प्रधानमंत्री के कुत्ते का खर्च तीन रूपये रोज का है।
वर्ष 1960 के दशक में ही डॉ. लोहिया ने देश की भावी समस्याओं को बखूबी समझ लिया था। इसीलिए वह कहा करते थे- गरीबी हटाओ, दाम बांधों, हिमालय बचाओ, अंग्रेजी हटाओं नदियां साफ करो, पिछड़ों को विशेष अवसर दो, बेटियों की शिक्षा व विकास का समुचित प्रबंध हो, गरीबों के इलाज का इंतजाम हो, किसानों को उपज का लाभकारी मूल्य मिले, खेती और उद्योग में समन्वय बनाकर विकास का एजेंडा तय हो, गरीबी के पाताल और अमीरी के आकाश का फासला कम करने के जतन हों। लोहिया के उठाये मुद्दे आज भी प्रासंगिक और ज्वलंत है। देश की राजनीति आज भी उनके इर्द गिर्द चक्कर काट रही है। लोहिया का शरीर जरूर शांत हुआ मगर उनकी आत्मा आज भी जिन्दा है। उनके विचार आज भी जन जन के प्रेरणाश्रोत है। उत्तर प्रदेश हो या बिहार लोहिया आज भी लोगों की जुबान पर है।

– बाल मुकुन्द ओझा

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