नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को देशभर के सभी सरकारी और निजी स्कूलों को लेकर एक अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि प्रत्येक स्कूल में लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था की जाए और उन्हें मुफ्त में सैनिटरी पैड उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जो स्कूल इन निर्देशों का पालन नहीं करेंगे, उनकी मान्यता रद्द की जा सकती है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह भी निर्देश दिया है कि हर स्कूल में दिव्यांग-अनुकूल (डिसेबल-फ्रेंडली) शौचालय बनाए जाएं, ताकि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को भी किसी तरह की असुविधा न हो। यह आदेश वर्ष 2024 में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद दिया गया है। यह याचिका जया ठाकुर द्वारा दायर की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि केंद्र सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता नीति (Menstrual Hygiene Policy) को पूरे देश में प्रभावी रूप से लागू किया जाए। कोर्ट ने माना कि स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी लड़कियों की शिक्षा और गरिमा दोनों को प्रभावित करती है।
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह आदेश केवल कानूनी या प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि उन कक्षाओं से भी जुड़ा है जहां कई बार लड़कियां अपनी जरूरतों के बारे में खुलकर बात नहीं कर पातीं। यह उन शिक्षकों के लिए भी है जो मदद करना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण असहाय महसूस करते हैं, और उन अभिभावकों के लिए भी है जो इस समस्या की गंभीरता को नहीं समझ पाते।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी समाज की प्रगति का पैमाना इस बात से तय होता है कि वह अपने सबसे कमजोर वर्ग की कितनी सुरक्षा और सम्मान करता है। यह फैसला उन सभी बच्चियों के लिए एक मजबूत संदेश है, जिन्हें केवल मासिक धर्म से जुड़ी समस्याओं के कारण स्कूल छोड़ना पड़ता था। सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई कि यह कदम शिक्षा व्यवस्था को अधिक समावेशी, संवेदनशील और समान बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित होगा।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश : स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट और मुफ्त सैनिटरी पैड अनिवार्य
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