भारत, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में, अपनी चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता पर गर्व करता है। इस प्रक्रिया की आधारशिला है मतदाता सूची वह निर्णायक दस्तावेज जो तय करता है कि कौन वोट दे सकता है और कौन नहीं। इसीलिए, सूची को शुद्ध, अद्यतन और त्रुटिहीन बनाए रखने की प्रशासनिक कवायद, जिसे मतदाता सूची शुद्धिकरण कहा जाता है, एक अनिवार्य कार्य है। हालांकि, विडंबना यह है कि हाल के वर्षों में यह तकनीकी और कानूनी प्रक्रिया राजनीतिक दलों के बीच गहन विवाद और टकराव का केंद्र बन गई है। शुद्धिकरण की नेक नीयत वाली पहल अब राजनीतिक प्रतिशोध और लक्षित भेदभाव के आरोपों के बोझ तले दबकर, स्वयं लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर संकट पैदा कर रही है।
मतदाता सूची में समय-समय पर सफाई की आवश्यकता होती है। मृत्यु, एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण, पते या नाम में त्रुटियां, और अयोग्यता—ये वे सामान्य कारण हैं जिनके चलते सूची को निरंतर अद्यतन करना आवश्यक है। भारतीय निर्वाचन आयोग यह कार्य बूथ स्तरीय अधिकारियों (BLOs) और दावों-आपत्तियों की एक विस्तृत कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से करता है। सैद्धांतिक रूप से, यह प्रक्रिया “एक वोट, एक व्यक्ति” के सिद्धांत को सुनिश्चित करती है। लेकिन व्यवहार में, इसकी पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।
विवाद का मूल केंद्र प्रशासनिक कमियों से हटकर राजनीतिक दुर्भावना के आरोपों में निहित है। विपक्षी दलों का यह आम आरोप है कि सत्तारूढ़ दल या उनके इशारे पर काम करने वाले अधिकारी जानबूझकर एक विशेष वर्ग या समुदाय के मतदाताओं के नाम को सूची से हटाते हैं। यह आरोप विशेष रूप से उन क्षेत्रों में मुखर होता है जहाँ राजनीतिक मुकाबला कांटे का होता है या जहाँ कोई विशेष समुदाय विरोधी दल का मजबूत समर्थक माना जाता है। ऐसे में, “अपात्रता” का बहाना बनाकर कमजोर वर्गों, अल्पसंख्यकों या शहरी गरीबों के नामों को मनमाने ढंग से हटाए जाने की शिकायतें आती हैं। जब कुछ विशिष्ट मतदान केंद्रों या विधानसभा क्षेत्रों में निष्कासन की दर असामान्य रूप से अधिक पाई जाती है, तो ये आशंकाएँ बलवती हो जाती हैं कि यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि राजनीतिक इंजीनियरिंग का हिस्सा है।
इसके साथ ही, नए और पात्र मतदाताओं को जोड़ने की प्रक्रिया में भी भेदभाव के आरोप लगते हैं। विरोधी दलों के संभावित समर्थकों विशेषकर युवा मतदाताओं या प्रवासियों के आवेदनों को अनावश्यक देरी या मामूली तकनीकी कारणों से खारिज किए जाने की शिकायतें मिलती हैं। यह दोहरी मार चुनावी प्रक्रिया की नींव को हिलाती है: एक तरफ योग्य नाम हटाए जाते हैं, और दूसरी तरफ योग्य नाम जोड़े नहीं जाते।
हाल के वर्षों में, आधार कार्ड को मतदाता सूची से जोड़ने के सरकारी प्रयास ने इस विवाद को और गहरा किया है। यद्यपि इसका उद्देश्य प्रतिलिपि को रोकना था, लेकिन आलोचकों ने इसे निजता के उल्लंघन और सबसे बढ़कर, राजनीतिक रूप से “असुविधाजनक” मतदाताओं को हटाने के लिए एक गुप्त हथियार बनने की आशंका जताई। विभिन्न राज्यों से ऐसी खबरें सामने आईं, जहाँ आधार लिंक न करने के कारण लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए। भले ही निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया कि आधार लिंक न करना हटाने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता, लेकिन जमीनी स्तर पर हुई मनमानी ने मतदाताओं के बीच भय और अविश्वास का माहौल पैदा कर दिया।
मतदाता सूची शुद्धिकरण के इस राजनीतिकरण का भारतीय लोकतंत्र पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। सबसे पहले, यह चुनावी परिणामों की विश्वसनीयता को धूमिल करता है। जब नींव ही संदेह के घेरे में हो, तो पूरी इमारत पर विश्वास करना कठिन हो जाता है। दूसरे, यह सीधे तौर पर योग्य नागरिकों के संवैधानिक मतदान के अधिकार का उल्लंघन है। लोकतंत्र में भागीदारी का पहला अधिकार ही छीन लिया जाए, तो चुनावी प्रक्रिया का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अंततः, यह आम नागरिक को चुनावी प्रक्रिया से विमुख करता है। यदि मतदाता को यह डर सताएगा कि उसका नाम कभी भी मनमाने ढंग से हटाया जा सकता है, तो वह पूरे तंत्र में विश्वास खो देगा।
इस विकट स्थिति में, भारतीय निर्वाचन आयोग की भूमिका सर्वोपरि है। निर्वाचन आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि शुद्धिकरण की प्रक्रिया राजनीतिक दबाव से पूर्णतः मुक्त हो और शीशे की तरह पारदर्शी हो। हटाए गए प्रत्येक नाम के पीछे का कारण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होना चाहिए और संबंधित मतदाता को पर्याप्त नोटिस तथा सुनवाई का उचित अवसर मिलना अनिवार्य है। बीएलओ को राजनीतिक दबाव से बचाना और उनका कठोर प्रशिक्षण आवश्यक है, ताकि वे केवल कानूनी प्रावधानों का पालन करें। डिजिटल निगरानी और स्वतंत्र अंकेक्षण की व्यवस्था करनी होगी ताकि उच्च निष्कासन दर वाले क्षेत्रों की तत्काल जाँच हो सके।
निष्कर्षतः, मतदाता सूची शुद्धिकरण एक प्रशासनिक सर्जरी है, जिसे राजनीतिक सिद्धांत के बजाय कानूनी व्यावसायिकता के साथ किया जाना चाहिए। जब यह प्रक्रिया राजनीतिक हितों की भेंट चढ़ जाती है, तो यह केवल कुछ हजार नामों का निष्कासन नहीं होता, बल्कि जनता के विश्वास और लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास होता है। निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए, निर्वाचन आयोग और राजनीतिक दलों को जिम्मेदारी लेनी होगी और सूची को विवाद का नहीं, बल्कि देश के नागरिकों की भागीदारी का प्रतीक बनाए रखना होगा।
– महेन्द्र तिवारी



